शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

मेरे अजनबी

बहुत दम भरते थे तुझे जानने का हम,
आज जाना तो लगा तुझे जानते ही नहीं।

हालातों की धुल सी यूं चेहरे पे पड़ गई,
देखा जो आइना तो लगा खुद को पहचानते ही नहीं।

तेरा हँसता सा चेहरा तो बस आँखों में बस गया,
इस चेहरे की हकीक़त को मगर हम पहचानते ही नहीं।

पूरा घर तो तुमने तस्वीरों से भर दिया,
ख़ाली है पर दिल का कोना लोग यह मानते ही नहीं।

जाने कहाँ तूने अपने अश्कों को बांधा है,
खुश्क आँखों के कोने यह राज जानते ही नहीं।

पानी का है बुलबुला यह पल भर में फूटेगा अब,
मालूम तो है यह हक़ीकत पर हम मानते ही नहीं।

हर कोई यहाँ खुद से इक जंग में उलझा है,
इसे सुलझाने की तरकीब मगर जानते ही नहीं।

© उपमा डागा पार्थ २०१२