सोमवार, 2 अप्रैल 2012

नन्ही फ़रियाद!

इक प्रीत भरा बचपन,
अपनी माँ से बिछड़ गया।
स्टेशन की भीड़ में,
उसका हाथ ही छिटक गया।

अनजाने चेहरों में ,
वो इक चेहरा तलाशती होगी,
मम्मी-मम्मी कहती वो ,
इधर उधर भागती होगी,
कभी वो रो रही होगी,
कभी खुद ही चुप हो रही होगी,
कभी अपने ही हाथों से
आंसू पोंछती होगी,
उसने अपनी सारी शैतानियाँ ,
अब ताक पे रख दी होंगी,
उसकी मासूम आँखें बस,
माँ के लिए तरसती होंगी।

खुदा करे! वो दुनिया के,
सबसे अच्छे हाथों में आए।
जो महफूज़ रखे उसको,
और अपनों तक पहुंचाए।

मैं दुआ करती हूँ उसके लिए,
आप सब भी करना।
ऐ खुदा 'प्रीत' पर हमेशा,
रहमत की नज़र करना।

Dedicated to the little girl Preet Kaur (Palki) who went missing from Amritsar in January 2012

© उपमा डागा पार्थ २०१२

निशा अब शांत है

आज निशा चुप है
बिलकुल शांत
मानो एक विराम मिल गया हो
बारह सालों के संघर्ष का
घर से ऑफिस, ऑफिस से घर
बच्चों की परवरिश,
स्कूल की फ़ीस,
मकान की किश्त,
महीने का राशन,
बस का किराया,
सब्जियों के भाव

बारह साल पहले
उसने जंग शुरू की थी
पियक्कड़ पति के खिलाफ,
उसकी ज्यादतियों के खिलाफ,
ख़तम होती सहनशक्ति के खिलाफ

पर क्या हासिल हुआ उसे
एक के बाद एक पेशी
निचली से ऊपरी अदालत
ख़तम होती जमा पूंजी
कम होते गहने और
टूटती उम्मीद

पर आज वो फिर एक बार आयी थी
सारी हिम्मत जुटा
पुराने पर्स में रखे
कुछ आखिरी पैसे
अपने वकील के लिए ले
वह चल दी
फ़ैसले के इंतज़ार में

पर अदालत में
फटे बम के बारूद पर
निशा का भी नाम था
उस आवाज़ को सुन वह जब तक पलटती
किसी और अदालत
का दरवाज़ा खटखटाती
तब तक बारूद ने उसको
हवा में उड़ा दिया

उसकी आँखों का प्रश्न चिन्ह
धुंए के गुबार ने छिपा दिया
एक हाथ में केस की फ़ाइल,
दूसरे में छोटा सा पर्स,
और उसमें रखे कुछ मुड़े तुड़े नोट
कोई भी इस फ़ैसले के लिए तैयार नहीं था
और
नेताओं का बयान जारी था।

७ सितम्बर, २०११ को दिल्ली हाई कोर्ट में हुए आतंकवाद की घटना पर

© उपमा डागा पार्थ २०१२