हे कृष्ण! तुझे फिर से आना होगा,
रिश्तों में उलझे पार्थ को,
फिर से गीता का मर्म समझाना होगा।
अभिमन्यु को समय के अभेद,
चक्रव्यूह में जाना सिखाना होगा,
पर बाहर आने के भेद के लिए,
हे लीलाधर! सुभद्रा को जगाना होगा।
कहीं फिर से सकुचाती दुल्हन,
द्रौपदी, पांचाली न बन जाये,
माँ कुंती को इस बार हे मुरलीधर!
बोलने से पहले चुप करवाना होगा।
सदियों से वो 'सूर्यपुत्र' भील बन के,
माँ की ममता को तरसा है,
इस युग में हे गिरिधर!
तुम्हें कर्ण को इन्साफ दिलवाना होगा।
माना कि गुरु द्रोणाचार्य के लिए,
अर्जुन सर्वश्रेष्ट है, महान है,
पर इस बार हे केशव! एकलव्य का
अंगूठा भी कटने से बचाना होगा।
द्रोपदी की आबरू बचाने के लिए,
हे माधव! तेरा आना तेरा धर्म ही सही,
पर पत्नी को वस्तु की तरह दाव पर लगाने पर
अब धर्मराज को भी धर्म का सही राह बताना होगा।
एक युग से राजा की सेवा में रत,
भीष्म को अच्छे बुरे का भेद बताना होगा,
राज्य से पहले अब गंगा पुत्र को
हे सर्वपालक! पितामह बन के दिखाना होगा।
हे वासुदेव! अब देखना द्रोपदी कहीं फिर से,
'अँधे का पुत्र अँधा' कह के हँस न दे,
अब उसे शब्दों के बाण लगने की,
व्यथा का परिणाम पहले से ही बताना होगा।
हे चक्रधर! सदियों से उलझे इस ताने बाने की,
इक-इक गाँठ और इक-इक उलझन को,
प्यार की मरहम से, हल्के हाथों से खोलकर,
अब नए युग का महाभारत होने से बचाना होगा।
© उपमा डागा पार्थ २०१३
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