जिन्दगी की रहगुजर में कोई कमी सी रह गई,
मिल गई कई सौगातें बस तेरी कमी सी रह गई।
अश्कों के बह जाने की रवायत के हम कायल ना थे,
अश्कों के बह जाने की रवायत के हम कायल ना थे,
फिर न जाने पलकों पे क्यों यह नमी सी रह गई।
आपकी दुनिया में हम दोस्ती की हिमाकत कर बैठे,
यह गल्ती बस इक बार हुई यह खलिश सी रह गई।
वो ख़्वाब जो दिन रात हम खुली आँखों से भी देखा किये,
उन ख़्वाब को बस शब भर जीने की तम्मना रह गई।
पा कर जब खोया तुझे तो यह एहसास पहली बार हुआ,
© उपमा डागा पार्थ २०१२
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें