सोमवार, 25 नवंबर 2013

तल्ख़ियां

कुछ तो मजबूरियां इन साँसों की भी रही होगी,
यूं ही कोई किसी पे एहसां नहीं करता।

एक दस्तूर की तरह ज़िंदगी को जिए जा रहे है हम,
वरना इस जहाँ में रहने को अब मन नहीं करता।

हदों की बोली इक रोज जरा हमको भी समझा दो,
यह शहर हमारी बेतकल्लुफी पसंद नहीं करता।

बुतों के इस मुल्क के अजब रिवाज़ों के सदके,
अब यह दिल खोने पे कभी रंज नहीं करता।

तेरी दोस्ती की हकीकत जो मैं लोगों को बताता,
कोई भी आज हमें बेवफाई के तंज नहीं करता।

हर शख्स की आँख नम है और होठों पे बेबसी,
फिर भी दिल की चोटों की वो मरहम नहीं करता।

ए काश कि जीने की कोई आसां सी सूरत होती,
इस जमीं पे तब कोई, जन्नत जन्नत नहीं करता।

© उपमा डागा २०१३


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