शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

कब तक?

काश उद्धार की कोई हल्की सी आशा ही नज़र आए...

अब तो लहू भी रिस रिस के जम सा गया है
जनता का आवेश भी मानों थम सा गया है।

कल की तरह वो आज भी चीत्कार रही है
संभलो! कि बेटी तुम्हें अब भी पुकार रही है।

कुछ तो इन रक्तबीजों की गिनती में कमी आए,
कोई आ के इनको मर्यादा के मायने समझाए।

नारी और भोग्या में अंतर समझ में आए,
या इनकी मृतप्राय आत्मा को ही होश में लाए।

बेशक फिर से लौट के सतयुग न चाहे आए,
पर यह धरती सरक के रसातल में तो ना जाए...

© उपमा डागा पार्थ २०१३

रविवार, 21 अप्रैल 2013

बेटी

चलो आओ कि
दफ़ना आए उसे...

इससे पहले कि
घर की दीवार
कमजोर हो जाए,
सड़क पे चलना
भी मुहाल हो जाए,
सिर्फ वहशियों का
यह समाज हो जाए,
कानूनों की बैसाखी
से भी वार हो जाए।
चलो आओ कि
दफ़ना आए उसे…

इससे पहले कि
माँ की ममता का,
कत्लेआम हो जाए,
बाप का ढाढ़स
सरे-आम नीलाम हो जाए,
भाई की राखी से
भी सवाल हो जाए,
हंसी की खनक की जगह
चीखों-पुकार हो जाए।
चलो आओ कि
दफ़ना आए उसे…

इससे पहले कि
मद्दम धुंधलाती रोशनी
भी अंधकार हो जाए,
थके, टूटे, कमजोर कदम
भी लाचार हो जाए,
घटती बढ़ती सिसकियाँ
भी काली नाद हो जाए,
अवशेषों में बचा इंसान
भी खूँखार हो जाए,
चलो आओ कि
दफ़ना आए उसे…

क्यों जन्म दे कर उसे
जिन्दगी के रंग दिखाए,
“बड़ी सुहानी है यह दुनिया”
यह पाठ उसे हम पढ़ाए,
कंकालों की बस्ती में
इंसानियत के गीत सुनाए,
सुरक्षा के नाम पर
जब सब गूंगे बहरे हो जाए,
तो अच्छा है कि
दफ़ना आए उसे...

© उपमा डागा पार्थ २०१३