गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

९ से ५

शहर भर के परिंदे न जाने कहाँ गए,
शायद अब वो भी घड़ी की सुईयाँ देख के उड़ा करते हैं।

एहसास, तम्मना, जिन्दादिली और चाहत,
जिन्दा हैं सभी शब्द, पर कहानियों में मिला करते हैं।

फिज़ा भी पेड़ों पे अब भूले से कभी आती है,
खिलते तो हैं कुछ फूल, पर डर-डर के खिला करते हैं।

बसों के आने जाने सा यह घटता बढ़ता साँसों का शोर,
सुनते तो हैं रोज पर महसूस कम ही किया करते हैं।

९ से
५ की जिन्दगी में सब यूं उलझ के बैठे हैं,
हँसते तो हैं रोज पर राशन पे हँसा करते हैं।

© उपमा डागा पार्थ २०१२