कुछ खामोशियाँ अच्छी लगती हैं,
अपने आप में सिमटी,
बिना कहे कुछ कहती,
जरा रुकी-रुकी, ठहरी-ठहरी,
कभी इक मुस्कान सी लाती,
कभी आँख नम करती,
महज खुद को जीती,
कुछ खामोशियाँ अच्छी लगती हैं...
कुछ खामोशियाँ चुप सी रहती हैं,
अपने होने से डरती,
सवालों जवाबों से बचती,
स्याह अंधेरों में भटकती,
बीती बातों में कहीं उलझी,
उदास ख़त की तरह हँसती,
बस कटने के लिए कटती,
सिर्फ अपने नाम को जीती,
कुछ खामोशियाँ चुप सी रहती हैं...
© उपमा डागा २०१४
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| फ़ोटो: एलिज़बेथ हागन |
बिना कहे कुछ कहती,
जरा रुकी-रुकी, ठहरी-ठहरी,
कभी इक मुस्कान सी लाती,
कभी आँख नम करती,
महज खुद को जीती,
कुछ खामोशियाँ अच्छी लगती हैं...
कुछ खामोशियाँ चुप सी रहती हैं,
अपने होने से डरती,
सवालों जवाबों से बचती,
स्याह अंधेरों में भटकती,
बीती बातों में कहीं उलझी,
उदास ख़त की तरह हँसती,
बस कटने के लिए कटती,
सिर्फ अपने नाम को जीती,
कुछ खामोशियाँ चुप सी रहती हैं...
© उपमा डागा २०१४

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