अपने रंजों गम की स्याही जो हमने पोंछी तो,
काजल की डिबिया सा दुनिया का अक्स नज़र आया।
परवाज़ हूँ मैं, हर हाल में उड़ना है मेरी फितरत,
घायल था वो परिंदा पर यही गाता नज़र आया।
हौंसला परखने को जब समंदर ने तूफां को पुकारा,
साहिल की तमन्ना थी, जो इक तिनका नज़र आया।
तन्हाईयों से घबरा के जो काफिला भीड़ का पकड़ा,
साथ चलता हर इक शक्स बेबस सा नज़र आया।
जिन्दगी ने कई पन्नों पे इक सवाल को दोहराया,
पर हर बार उसका जवाब मुख्तलिफ़ ही नज़र आया।
ख्वाबों और हकीकत का राफ्ता अभी न हो तो न सही,
क्या होगा वो आलम जब यह मंजर कभी नज़र आया।
शिकस्तों से घबरा के जो दम तोड़ने लगी हँसी,
सूली पे लटकता ईसा का चेहरा नज़र आया।
© उपमा डागा पार्थ २०१२