गुरुवार, 24 मई 2012

बेसुरे प्रश्न

लोग कहते हैं
तुम्हारी कविता में लय नहीं है,
कुछ सुर नहीं है, मेल नहीं है।
कहाँ से लाऊं मैं सुर बताओ -
मैं रास्ते में पड़े हुए शब्द बीनता हूँ,
इधर उधर छिटके कुछ अक्षर चुनता हूँ,
फिर आज के माहोल में ढालता हूँ,
उनसे जो बन पाए वही निकलता हूँ।
आज के दौर में,
भ्रष्टाचार तो है,
पर सादगी नहीं है।
नेता तो हर तरफ हैं,
पर आदमी नहीं है।
मेट्रो की लाइन तो हैं,
पर पुल में मजबूती नहीं है।
बाबा तो हर मोड़ पर हैं,
पर चमत्कारी विभूति नहीं है।
हर कोई यहाँ अपने,
मतलब की रोटी सेकता है।
दीन धरम तो छोड़ो,
माँ बेटी की आबरू भी बेचता है।
खुद को ही भगवन बना,
रोज माथा टेकता है।
अपना पेट भर कर, लोगों के,
मुहं का निवाला फेंकता है।
कभी ख़ुद से शर्मसार हो,
मैं अपने शब्द ख़ुद ही छुपाता हूँ।
समाज का यह अक्स देख कर,
मैं खुद ही काँप जाता हूँ।
प्रश्न मेरी आँखों में हैं,
दिल में हैं
और जेहन में भी हैं।
तो प्रश्न तो प्रश्नों की,
भाषा ही जानते हैं।
प्रश्न तो
न सुर को,
न लय को,
और न ताल को
पहचानते हैं ...

© उपमा डागा पार्थ २०१२

बुधवार, 23 मई 2012

एहसास

मिट्ठी, यह नाम लेते ही हमारे मुंह में एक मिठास सी घुल जाती है। आज उसी की बारहवी सालगिरह पर उसे तोफहे में क्या दें बस इसी कशमकश में थी कि ख्याल आया कि कुछ ऐसा देना चाहिए जो सदैव उसके पास रहे। चंद शब्दों को बटोर कर उसके लिए एक सपना बुना है... और अब वो समय आ गया है जब शब्दों के मायने उसको समझ आने लगेगें।
मेरी बेटी के लिए एक तोहफा (24 मई  2012):

दुआएं तो बिना बोले सारी ही तुम्हारी है,
फिर भी चंद सतरें कागज पे उतारी हैं,
कुछ मुस्कुराहटें जो मैंने उम्र भर में कमाई है,
वो साथ रहे तेरे ज्यों तेरी ही परछाई है,
मैं चाँद न तारे कभी तेरे लिए ला पाऊंगी,
पर जीवन की दुपहरी में कभी छोड़ के न जाऊंगी,
मेरे बस में अगर होता तुझे आँखों में छुपा लेती,
तेरे सारे ग़मों को मैं हसीं में बदल देती,
मेरे अशार तुझे शायद अब न समझ आयेंगे,
पर शायद यह कभी तुम्हें जिन्दगी के मायने समझाएंगे,
तुम इनको वक़्त की कसौटी पे रख के देख लेना,
इन खट्टे मीठे लफ्जों को कभी यूं ही चख के देख लेना,
कभी यह बन के तेरे हमराज तेरे साथ ही हो लेंगे,
कभी मेरी छुअन बन के तुझे प्यार से यह चूमेंगे,
कभी आ के रातों में तुझे सहला के सुला देंगे,
कभी मेरी तरह आ के तुझे नींद से जगा देंगे,
कभी बस ऐसे ही आ के वो तुझ से लिपट जायेंगे,
हम हैं! बस चुपके से यह एहसास करवा जायेंगे,
हम हैं! बस चुपके से यह एहसास करवा जायेंगे!

© उपमा डागा पार्थ २०१२

माँ

माँ—एक शब्द जो होठों पे एक मुस्कान और चेहरे पे एक सकूं सा छोड़ जाता है… या फिर एक सहारा जो मुश्किल में हमें थाम लेता है, या फिर एक एहसास जो वजूद को दुनिया से बचा के रखता है। माँ के इतने रूप हैं कि चाहते हुए भी उसे एक धागे में पिरोना नामुमकिन सा लगा।

मैंने एक छोटा सा प्रयास किया है माँ के भिन्न -भिन्न रूपों को तीन अलग कविताओं में दर्शाने का—कभी वो परेशां है अपनी बेटी की शादी न होने से तो कभी उसका अपना परिवार उसके बुढ़ापे से। और आखिरी कविता में वो माँ है जिसने मुझे इस लायक बनाया कि मैं कुछ रच सकूँ।

मैं उनके बारे में ज्यादा नही बस यही कहूँगी कि तेरे एहसास से ही इक सोंधी सी महक आती है, माँ तेरे होने से मेरी दुनिया खुशगवार हो जाती है। उस खुदा का शुक्रिया भी करना चाहूंगी जिसने माँ जैसी नेमत दे कर हमें अपने होने का एहसास दिलाया।

1

आज माँ फिर से परेशां है।
ऑफिस से आते ही,
माँ के जल्दी जल्दी चलते हाथ
और माथे पर पड़े परेशानियों के बलों ने
उसे एक अनकहा सन्देश पहुंचा दिया,
फिर किसी की कही बात ने
माँ का दिल दुखा दिया।

एक बेटी...
जो कमाती तो है
पर ब्याहता नहीं है।
जो कब से तीस के पार है
पर योग्य वर का अभी भी इंतज़ार है।

यह सुनते सुनते उसके कान पक गए हैं,
उसे लगा शायद बोलने वाले भी थक गए हैं,
पर लोग चुप रह कर भी चुप नहीं रहते हैं,
कभी दबी आवाज़ में, तो कभी मुहं पे ही कुछ कहते हैं।

वो सोचती कोई उसको घर बैठे तो नहीं खिलाता है,
तब उसके बारे में सोच कर उनका क्योँ कौर अटक जाता है,
क्योँ ये सवाल, ये ताने, मेहमान बन कर आते हैं
फिर उसके ही घर में रह कर उसे चिढ़ाते हैं?
रिश्ते भी अब जो आते हैं तमाशाइयों की तरह लगते हैं,
उम्र के तराजू में वो हर बात को परखते हैं,
मर्द तो बयालीस के भी बांके जवान कहलाते हैं
फिर औरतों की बारी में क्योँ पैमाने बदल जाते हैं
शादी न होने के कारण उसपे प्रश्नचिंह क्यों लगाये जाते हैं
क्यों उसे झिंझोड़ कर अकेलेपन के बादल दिखाये जाते हैं।

पर माँ है कि इसी चिंता में घुली जाती है
रिश्तेदारों के सवालों से कतराती है
पड़ोसियों की नजरो से खुद को बचाती है
कभी खुद को संभालती तो कभी हताश हो जाती है।

वो पलट के कई बार लोगो को चुप करवाना चाहती है
पर माँ को देख कर फिर खुद ही चुप हो जाती है
कोई बताये उसे कि वो इस अविवाहिता रूपी लेबल का क्या करे
अब तक छह पंडितो से मिल चुकी है,
तीन बार पूजा रखवा चुकी है,
पांच अंगूठियाँ पहन कर निकलती है,
दो तावीज़ भी बांधे रखती है।

वो
हर बार माँ की परेशानी कम करने की कोशिश करती है।
पर माँ है कि
माँ होने के कारण,
हर बार परेशां हो ही जाती है|

2

सुनो जी! माँ अब बूढी हो गई है।
ऑफिस से आते ही बीवी ने यह बताया,
चिंता में मैंने अपना हाथ सर पे लगाया।
घुटने का दर्द उनका फिर से बढ़ गया है,
कल शाम से गर्दन में भी बल पड़ गया है,
न रात को ढंग से सोती हैं,
न दिन में चैन आता है,
ऊपर से उनका खांसी
जुकाम न कभी जाता है,
मैं सारा दिन घर में
इधर से उधर फिरती हूँ,
कभी बच्चों कभी माँ के बीच
चक्की की तरह पिसती हूँ।
मैं हूँ-हाँ करके इधर उधर देखता हूँ,
अपनी बूढी माँ के कमरे की तरफ बढता हूँ।
बीवी कहती है - माँ अब आँखों से कम देख पाती है,
फिर कैसे वो मेरे माथे के बल पढ़ पाती है।
वो माँ जिसको कोई आवाज़ मुश्किल से सुनाई देती है,
वो कैसे मेरे बोलों में बेचैनी भांप लेती है।
मेरी बूढी माँ जो दिन बहर खांसती रहती है,
वो कैसे सुबह मेरे लिए चाय बना लती है।
वो माँ जो कभी बुखार से
तो कभी दर्द से तडपती है,
वो कैसे हर समय,
कुछ बुनती,कुछ काटती
तो कभी कपडे तह लगाती है।
पर बीवी है वो मेरी
वो सही ही सोचती होगी
शायद माँ धीरे धीरे
बूढी हो चली होगी...

3


ठंडी हवा की तरह माँ आ के थपथपा जाती है,
जाने कैसे वो थकी आँखों को सोने के लिए मना पाती है,
माँ हर टुकड़े में से मेरा एक कौर निकाल लेती है,
मेरा पेट भर के वो मुस्कुराती हुई सो जाती है।

मुझे बचपन की कोई लोरी उसकी याद नहीं,
पर मेरे रतजगो में वो जगती हुई दिख जाती है,
कभी तो खुद ही उदासी के बादलों से लड़ती है,
और कभी सावन की बूंदों की तरह बिखर जाती है।

वो अपना बचपन भी मेरी आँखों से देखती है,
और ख़्वाबों के तिलस्म भी मेरे लिए माँ बुनती है,
मेरी मुस्कुराहट से मेरे राज सारे जान जाती है,
हँसी के ढेर में भी वो इक फीकी हँसी पहचान लेती है।

उसके लिए न मंदिर में घंटी न मस्जिद में दुआ मांगी जाती है,
पर इक हलकी सी चोट पे भी माँ की याद सबसे पहली आती है,
जिन्दगी की धूप में वो छांव बनी नज़र आती है,
और कभी  इक आंसू से वो मोम सी पिघल जाती है।

तेरे एहसास से ही इक सोंधी सी महक आती है,
माँ तेरे होने से मेरी दुनिया खुशगवार हो जाती है।

© उपमा डागा पार्थ २०१२