रविवार, 19 अगस्त 2012

दहशत

मैं इसलिए परेशां हूँ,
क्योंकि मैं इक बेटी की माँ हूँ।

अब राक्षस सिर्फ साधु वेश में नहीं आते,
न ही वे बड़े-बड़े दांतों से हैं डराते।
बन के वो अपने, हमारे आस पास ही हैं मंडराते,
मौका लगते ही हमारे विश्वास का हरण कर जाते,
फिर छोटी सी मासूम हड्डियाँ हम निठारी में हैं पाते,
कुछ दिनों के लिए अख़बार की सुर्खियाँ बन जाते।

यह खबर सबके दिलों में इक हलचल तो मचाती है,
पर ठोस कदम के नाम पर इक चुप्पी सी छा जाती है।
धीरे-धीरे यह सुर्खियाँ बस केस बन के रह जाती हैं,
पहले की जगह खबर दुसरे पन्ने पे खिसक जाती है।
वो भावनाओं की जवालामुखी भी वक़्त पा के शांत हो जाती है,
और जिन्दगी फिर से वापिस इक रौ में आ जाती है।

समाज का घिनौनापन सब फिर से भूल जाते हैं,
और विश्वास के कटघरे में खुद को ही खड़ा पाते हैं।
रिश्तों की चादर ओढ़े यह कभी घर में घुस जाते हैं,
कभी गुरु के वेश में हम गुरुकुल में इनको पाते हैं।
बनके पड़ोसी यह कभी अपने जाल में फंसाते हैं,
और कभी यह अजनबी लालच से लुभाते हैं।

क्या करूँ अपनी बच्ची को मैं किस जगह ले जाऊँ ,
नन्हें से इस मोती को कौन सी सीप में छुपाऊँ।
यह हँसी, यह मासूमियत, मैं कैसे इनका खूं कराऊँ,
समाज के इन वहशियों से मैं उसको कब तक बचाऊँ,
हाथ पकड़ के कैसे मैं उसको हर जगह ले जाऊँ,
इन घिनौने चेहरों को मैं उसको क्यों कर दिखाऊँ।

सोचती हूँ मैं, आप भी कुछ तो सोचना,
दो पल के लिए समय निकाल के सोचना।
नन्हीं मासूम किलकारियों के लिए सोचना,
समाज की विशप्त तस्वीर सुधराने के लिए सोचना।
चाहे इनके लिए सतरंगी आसमां को न सोचना,
पर बेटियों का बचपन बचाने के लिए सोचना...

© उपमा डागा पार्थ २०१२