जीवन की भागादौड़ी में,
कुछ पल जो हमसे छूट गए,
वो पल जो हँसना चाहते थे,
कुछ हमसे कहना चाहते थे,
कुछ हमें सुनाना चाहते थे,
हमें पास बिठाना चाहते थे,
लफ्ज़ों को ताक पे रख के वो,
बस आँखें पढ़ना चाहते थे,
हाथों में हाथ पकड़ के बस,
कुछ महसूस करवाना चाहते थे,
सूरज की लाली में खुद को,
अन्दर तक डुबोना चाहते थे,
हवा के चंद झोकों के संग,
अठखेलियाँ करना चाहते थे।
वो पल अब कहीं चले गए—
मैं तब भी काम में उलझा था,
मैं अब भी काम में उलझा हूँ,
न बीते हुए को बुलाता हूँ,
न आने वालों को संवारता हूँ,
आज भी उनकी आवाज़ को सुन,
बस यही मैं कहता रहता हूँ—
तू चल, दम भर बैठ जरा,
इक काम निपटा के आता हूँ...
© उपमा डागा पार्थ २०१२
तू चल, दम भर बैठ जरा,
इक काम निपटा के आता हूँ...
© उपमा डागा पार्थ २०१२