काश कुछ लम्हों को हम अपनी गिरफ़्त में रख पाते,
तो आज अपने सर पे तेरे हाथ की न कमी पाते।
तेरी गोद से उठने की जो खता हम न करते,
तो आज तेरे क़दमों में इस सर को झुका पाते।
तूने नाज़ जो हमारे तब यूं न उठाये होते,
तो आज अपनी जिद पे हम खुद को न खफ़ा पाते।
तेरी ऊँगली को पकड़ के जो चलना न सीख पाते,
तो दुनिया की इस दौड़ में दो कदम भी न चल पाते।
तूने नींद को मेरी जो कस के न डांटा होता,
तो तेरी कसम आज भी हम सकूं से न सो पाते।
तेरी जिन्दादिली ने हमको मुस्कुराने की वजह दे दी,
वरना इस जहाँ के ग़म हम हंस के न उठा पाते।
जिन्दगी के वर्क भी गर हम फिर से पलट पाते,
तो आज भी मचल के पहले पन्ने पे पहुँच जाते।
© उपमा डागा पार्थ २०१२
तो आज अपने सर पे तेरे हाथ की न कमी पाते।
तेरी गोद से उठने की जो खता हम न करते,
तो आज तेरे क़दमों में इस सर को झुका पाते।
तूने नाज़ जो हमारे तब यूं न उठाये होते,
तो आज अपनी जिद पे हम खुद को न खफ़ा पाते।
तेरी ऊँगली को पकड़ के जो चलना न सीख पाते,
तो दुनिया की इस दौड़ में दो कदम भी न चल पाते।
तूने नींद को मेरी जो कस के न डांटा होता,
तो तेरी कसम आज भी हम सकूं से न सो पाते।
तेरी जिन्दादिली ने हमको मुस्कुराने की वजह दे दी,
वरना इस जहाँ के ग़म हम हंस के न उठा पाते।
जिन्दगी के वर्क भी गर हम फिर से पलट पाते,
तो आज भी मचल के पहले पन्ने पे पहुँच जाते।
© उपमा डागा पार्थ २०१२
बहुत सुंदर कविता , उपमा
जवाब देंहटाएंnice one
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