आज निशा चुप हैबिलकुल शांत
मानो एक विराम मिल गया हो
बारह सालों के संघर्ष का
घर से ऑफिस, ऑफिस से घर
बच्चों की परवरिश,
स्कूल की फ़ीस,
मकान की किश्त,
महीने का राशन,
बस का किराया,
सब्जियों के भाव
बारह साल पहले
उसने जंग शुरू की थी
पियक्कड़ पति के खिलाफ,
उसकी ज्यादतियों के खिलाफ,
ख़तम होती सहनशक्ति के खिलाफ
पर क्या हासिल हुआ उसे
एक के बाद एक पेशी
निचली से ऊपरी अदालत
ख़तम होती जमा पूंजी
कम होते गहने और
टूटती उम्मीद
पर आज वो फिर एक बार आयी थी
सारी हिम्मत जुटा
पुराने पर्स में रखे
कुछ आखिरी पैसे
अपने वकील के लिए ले
वह चल दी
फ़ैसले के इंतज़ार में
पर अदालत में
फटे बम के बारूद पर
निशा का भी नाम था
उस आवाज़ को सुन वह जब तक पलटती
किसी और अदालत
का दरवाज़ा खटखटाती
तब तक बारूद ने उसको
हवा में उड़ा दिया
उसकी आँखों का प्रश्न चिन्ह
धुंए के गुबार ने छिपा दिया
एक हाथ में केस की फ़ाइल,
दूसरे में छोटा सा पर्स,
और उसमें रखे कुछ मुड़े तुड़े नोट
कोई भी इस फ़ैसले के लिए तैयार नहीं था
और
नेताओं का बयान जारी था।
७ सितम्बर, २०११ को दिल्ली हाई कोर्ट में हुए आतंकवाद की घटना पर
© उपमा डागा पार्थ २०१२
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