कुछ दिन बस यूं ही गुजर जाते है,
फ़कत अपने होने का बोझ लपेटे हुए,आँख खुलने से आखिरी करवट लेने तक,
एक सन्नाटा सा खुद में समेटे हुए,
सवाल जवाबों की धुरी से परे,
नए पैमानों में कुछ परखते हुए,
घड़ी की सुइयों की गिरफ्त में फसें,
इक सांस लेने को कहीं तरसते हुए,मौसम के हर मिजाज़ को ताक पे रख,
अपनी ही आग में झुलसते हुए,
ऐसे दिन शब्दों में बांधे नहीं जाते,
बस काटे जाते हैं बिना कोई तवक्को किये हुए।
© उपमा डागा पार्थ २०१२
Too good
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