लोग कहते हैं
तुम्हारी कविता में लय नहीं है,
कुछ सुर नहीं है, मेल नहीं है।
कहाँ से लाऊं मैं सुर बताओ -
मैं रास्ते में पड़े हुए शब्द बीनता हूँ,
इधर उधर छिटके कुछ अक्षर चुनता हूँ,
फिर आज के माहोल में ढालता हूँ,
उनसे जो बन पाए वही निकलता हूँ।
आज के दौर में,
भ्रष्टाचार तो है,
पर सादगी नहीं है।
नेता तो हर तरफ हैं,
पर आदमी नहीं है।
मेट्रो की लाइन तो हैं,
पर पुल में मजबूती नहीं है।
बाबा तो हर मोड़ पर हैं,
पर चमत्कारी विभूति नहीं है।
हर कोई यहाँ अपने,
मतलब की रोटी सेकता है।
दीन धरम तो छोड़ो,
माँ बेटी की आबरू भी बेचता है।
खुद को ही भगवन बना,
रोज माथा टेकता है।
अपना पेट भर कर, लोगों के,
मुहं का निवाला फेंकता है।
कभी ख़ुद से शर्मसार हो,
मैं अपने शब्द ख़ुद ही छुपाता हूँ।
समाज का यह अक्स देख कर,
मैं खुद ही काँप जाता हूँ।
प्रश्न मेरी आँखों में हैं,
दिल में हैं
और जेहन में भी हैं।
तो प्रश्न तो प्रश्नों की,
भाषा ही जानते हैं।
प्रश्न तो
न सुर को,
न लय को,
और न ताल को
पहचानते हैं ...
© उपमा डागा पार्थ २०१२
© उपमा डागा पार्थ २०१२
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