कल फिर तेरी जगह रख खुद को सोचा मैंने,
दर्द के सेहरा में तन्हा खड़ा पाया मैंने,
हर ख़ुशी ज्यों एहसान करके आती है,
उनका वजूद भी बस पल भर का पाया मैंने,
बहुत शिकवे किये थे जिन्दगी से मगर,
अब उसी के लिए खुद को तड़पता पाया मैंने।
वो जो अपने थे मेरे या हबीब थे,
उनको रातों को खुदा से लड़ते हुए पाया मैंने,
मेरी मासूम सी बच्ची भी मौत के मायने समझने लगी,
बचपन का सौदा कर अपना जीवन गंवाया है मैंने,
अब तो बातें मेरी मेरे लिए ही अजनबी सी हो बैठी हैं,
जाने इस ख़ामोशी को क्या खो के है पाया मैंने।
मेरे बाद मुझे अपनी यादों में बुला लेना हमदम मेरे,
तेरी आँखों से ही देखूँगी यह जहाँ जो बसाया है मैंने,
आज मायूस बैठी हूँ तो चंद अश्क बह चले है मेरे,
वर्ना कितने रोते हुए चेहरों को हंसाया है मैंने,
कुछ पल जो हंस के काटे वो समेटे तो लगा,
थोडा सा ही सही, पर जिन्दगी को खूब जिया है मैंने।
© उपमा डागा पार्थ २०१२
दर्द के सेहरा में तन्हा खड़ा पाया मैंने,
हर ख़ुशी ज्यों एहसान करके आती है,
उनका वजूद भी बस पल भर का पाया मैंने,
बहुत शिकवे किये थे जिन्दगी से मगर,
अब उसी के लिए खुद को तड़पता पाया मैंने।
वो जो अपने थे मेरे या हबीब थे,
उनको रातों को खुदा से लड़ते हुए पाया मैंने,
मेरी मासूम सी बच्ची भी मौत के मायने समझने लगी,
बचपन का सौदा कर अपना जीवन गंवाया है मैंने,
अब तो बातें मेरी मेरे लिए ही अजनबी सी हो बैठी हैं,
जाने इस ख़ामोशी को क्या खो के है पाया मैंने।
मेरे बाद मुझे अपनी यादों में बुला लेना हमदम मेरे,
तेरी आँखों से ही देखूँगी यह जहाँ जो बसाया है मैंने,
आज मायूस बैठी हूँ तो चंद अश्क बह चले है मेरे,
वर्ना कितने रोते हुए चेहरों को हंसाया है मैंने,
कुछ पल जो हंस के काटे वो समेटे तो लगा,
थोडा सा ही सही, पर जिन्दगी को खूब जिया है मैंने।
© उपमा डागा पार्थ २०१२
Very touching poem, Upma!
जवाब देंहटाएंBut i am hoping this cancer is not real! a bit worried. Will call up Parth.