शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

पल-छिन

जीवन की भागादौड़ी में,
कुछ पल जो हमसे छूट गए,
वो पल जो हँसना चाहते थे,
कुछ हमसे कहना चाहते थे,
कुछ हमें सुनाना चाहते थे,
हमें पास बिठाना चाहते थे,
लफ्ज़ों को ताक पे रख के वो,
बस आँखें पढ़ना चाहते थे,
हाथों में हाथ पकड़ के बस,
कुछ महसूस करवाना चाहते थे,
सूरज की लाली में खुद को,
अन्दर तक डुबोना चाहते थे,
हवा के चंद झोकों के संग,
अठखेलियाँ करना चाहते थे।
वो पल अब कहीं चले गए
मैं तब भी काम में उलझा था,
मैं अब भी काम में उलझा हूँ,
न बीते हुए को बुलाता हूँ,
न आने वालों को संवारता हूँ,
आज भी उनकी आवाज़ को सुन,
बस यही मैं कहता रहता हूँ
तू चल, दम भर बैठ जरा, 
इक काम निपटा के आता हूँ...

© उपमा डागा पार्थ २०१२

2 टिप्‍पणियां:

  1. हमेशा की तरह बहुत ही सुंदर

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  2. wah ji wah kya explanation di hai busy schedule ki ya true har pal zindagi ka kaam hi kaam main nikala jaa raha hai aur haath main ret ki tarah fisal raha hai. good well done keep it up.-jyoti mathur

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