गुरुवार, 6 सितंबर 2012

हसरतें

वो चाँद को पाने की हसरत,
वो फूलों को छूने की ललक।
वो गुड़िया की शादी की ख़ुशी,
वो छोटी मोटी कहा-सुनी।
वो दोस्तों के साथ हँसी मस्ती,
वो हर तरफ से बेफिक्री।
वो 'जल्दी आना' कहना मम्मी का,
वो मेरा कहना 'डोंट वरि'।
वो टूर से लौटना पापा का,
वो बैग टटोलना पापा का।
वो खुश होना एक पेन से भी,
वो उछल पड़ना कॉमिक्स से ही।
वो भाई बहनों की मीठी तकरार,
वो पापा की सचमुच की मार।
वो गाल सहलाना मम्मी का,
वो हमें समझाना मम्मी का।
वो रोते रोते सो जाना,
वो चुपके से आना पापा का।
वो सुबह मनाना पापा का,
वो स्कूल छोड़ के आना पापा का।
वो छोटी छोटी खुशियाँ थी,
वो छोटे छोटे आंसूँ थे।
वो छोटे छोटे सपने थे,
वो सब मेरे अपने थे।

वो सब अब बस चले गए!
अब उतनी जल्दी न हम हँस पायें,
न गीली हो आँखे जल्दी से।
अब रूठ तो जाएँ एक पल में,
पर माने जा के बरसों में।
कोई ऊँगली पकड़ के ले जाये मेरी,
मिलवा दे फिर से बचपन से।
कोई उंगली पकड़ के ले जाये मेरी ,
मिलवा दे फिर से बचपन से।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

2 टिप्‍पणियां:

  1. one of my favourite poems ever.
    makes me wonder "how did you know of my bacchpan". so we all went through the same stories...
    beautiful

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  2. नीता जी बचपन की यादों का एक पिटारा सबने ही सहेज के रखा होता है । किसी और को उस में झांकते देख अपना खजाना बरबस बरबस ही याद आ जाता है । धन्यवाद ।

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