नए पुराने मौसम को मैं जी भर के जीती हूँ,
दिल खोल के खुद पे हँसती हूँ और बंद आँखों से रोती हूँ।खवाबों की इस दुनिया में मेरा रोज का आना जाना है,
टूटी हुई चंद कतरनों से मैं नए ख्वाबों को बुनती हूँ।
रंगों के एक पिटारे को मैं पास हमेशा रखती हूँ,
मायूसी वाले लम्हों को खुशबाश रंगों से भरती हूँ।
दुनिया की भागमभागी में अपनी शर्तों पे चलती हूँ,
कभी चलते चलते रूकती हूँ, कभी रुकते रुकते चलती हूँ।
इस शोरोगुल के जंगल में मैं तन्हा सी भटकती हूँ,
बस दिल की बातें सुनती हूँ और पन्ने काले करती हूँ।
© उपमा डागा पार्थ २०१२
बस दिल की बातें सुनती हूँ और पन्ने काले करती हूँ।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना !
Aapki rachna pad kar aisa laga jaise aaine mein khud ko dekh liya
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