गुरुवार, 15 नवंबर 2012

दूरियाँ

सपने और आंसू दोनों आज आँखों से जुदा हैं,
इस बड़े शहर ने क्या-क्या न छुड़वाया हमसे।

सिली सी धूप भी बस छतों की हो के रह गई,
लम्बे होते मकानों ने इस नेमत को चुराया हमसे।

गाँव की पगडण्डी आज भी मायूस सी राह तकती है,
कोलतार की सड़कों ने अपनी मिट्टी को दूर करवाया हमसे।

कुओं का पानी जाने कब जा के बोतल में बंद हो गया,
मिनरल वाटर ने ताज़े पानी का स्वाद भुलाया हमसे।

शादी की हँसी ठिठोली फार्म हाउस में कहीं खो गई,
डी जे के शोर ने ठुमकते गीतों को जुदा करवाया हमसे।

खैरो-खबर के लिए फेसबुक अकाउंट ही अब काफी है,
इस लत ने खतो-खतूत का नाता तुड़वाया  हमसे।

कभी रस्ते में मिले तो पहचान लेना मुझको,
यहाँ की दूरियों ने कई रिश्तों को जुदा करवाया हमसे।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

2 टिप्‍पणियां:

  1. कभी रस्ते में मिले तो पहचान लेना मुझको,
    यहाँ की दूरियों ने कई रिश्तों को जुदा करवाया हमसे।

    अच्छी रचना .....................,,

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  2. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना./बहुत बधाई आपको पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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