आग—
एहसास दिलाती है,
मौसम के मिजाज़ का,
गर्मी में अपने शोलों का,
और सर्दी में अपनी तपिश का।
लेकिन धुँआ—
हर मौसम में सिर्फ,
दम घोंटता है,
बिना सर्दी गर्मी की
परवाह किये हुए।
तो बेहतर है—
आग को
एक ही बार झेलना,
या एक ही बार
सब स्वाह कर लेना।
बजाय इसके कि
हर बार उसी धुंए
के गुबार में जीना,
या साँसों को बस
चलने का नाम देना।
© उपमा डागा पार्थ २०१३
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