दिन भी आज
चादर ओढ़े बैठा है,
मानों
खुद चमकते चमकते
थक गया हो।
और माँग रहा हो
इक नींद उधार रात से,
और रात खामोश है
रोज की तरह,
क्योंकि वो जानती है,
न तो वो दिन को
एक मीठी नींद दे पाएगी,
और न ही सदियों के अँधेरों से,
कभी खुद ही निकल पाएगी...
© उपमा डागा पार्थ २०१३
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें