काश उद्धार की कोई हल्की सी आशा ही नज़र आए...
अब तो लहू भी रिस रिस के जम सा गया है
जनता का आवेश भी मानों थम सा गया है।
कल की तरह वो आज भी चीत्कार रही है
संभलो! कि बेटी तुम्हें अब भी पुकार रही है।
कुछ तो इन रक्तबीजों की गिनती में कमी आए,
कोई आ के इनको मर्यादा के मायने समझाए।
नारी और भोग्या में अंतर समझ में आए,
या इनकी मृतप्राय आत्मा को ही होश में लाए।
बेशक फिर से लौट के सतयुग न चाहे आए,
पर यह धरती सरक के रसातल में तो ना जाए...
© उपमा डागा पार्थ २०१३
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