शनिवार, 28 दिसंबर 2013

रास्ते के साथी

कुछ अजीब से बशर हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
ना वो रकीब हैं, न हबीब हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
न उन्हें कुछ दरकार मुझसे,
ना मुझे कोई ख्वाहिश,
फिर भी वो हमकदम हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
सोचों में कोई गुम है,
कोई मुस्कुरा रहा है,
अश्कों को भी पी रहे है,
मेरे रास्ते के साथी।
फिर मिलने का किसी से,
कोई वादा नहीं किया है,
आवाज़ दे के क्यों बुलाए,
मेरे रास्ते के साथी।
कभी जिंदगी से यूं ही,
जब मायूस बैठ जाएँ,
जीने का हुनर भी सिखाए,
मेरे रास्ते के साथी।

© उपमा डागा २०१३

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें