गलत कहते थे लोग
कि गंगा गई हड्डियां वापस नहीं आती
समय बदल रहा है
अब लाशें ढूंढ रही हैं –
चार कंधे, कुछ लकड़ियां
और अनंत काल से ढूंढे जाने वाली
दो गज जमीन
ढूंढने की इस कवायद को
लग्जरी का टैग दिया गया है
और जो लाशें
इतनी रसूखदार ना हो
कि वो अपने लिए
यह इंतजाम कर सकें
वो अपने आप को कर देती हैं
यूं ही गंगा के हवाले...
हड्डियां बनने का
इंतजार किए बगैर
पर गंगा को
शायद रास नहीं आया
पूरी की पूरी
लाशों का भार
आखिर अभी तक
उस पर सिर्फ
हड्डियों की ही तो
जिम्मेदारी थी
थकी हारी गंगा
दोबारा उन लाशों को
खींचती, घसीटती, बहाती
और आखिरकार बेबस, लाचार
अपने अख्तियार से बाहर
कर देती इस जिम्मेदारी को अस्वीकार
और निकाल देती उन मुर्दा शरीरों को
अपने पानी से बाहर
गंगा को कहां पता था
उसके किनारे भी
बह आई इन लाशों पर
कशमकश में पड़ जाएंगे
वारिसों की ठुकराई लाशों को
किस राज्य की तरफ भेजें
इस पर भी भ्रम में आ जाएंगे
जहां जिंदा लोगों की
सांसों के बाजार में
बोली लगाई जाएगी
वहां खामोश, फूली
लाशों की व्यथा
किसे नज़र आएगी
बिना रसूख वाली
ये लाशें
नहीं दे पाएंगी
अपनी अर्जी
किसी भी मानव अधिकारों के
पैरोकार को
अधिकारों की आवाज,
अगर उठती भी है,
तो वह सिर्फ हाजिर-नाजिर
शख्स की ही उठती है
सिर्फ लाशों की
हाजरी काफी नहीं है
दफनाने या जलाने का
सम्मान हासिल करने के लिए
सही ही तो है
अब समय बदल रहा है...
बिना वारिसों वाली
गंगा गई लाशें
वापस आ रही है...
दोबारा इस फानी संसार में
गलत कहते थे लोग
कि गंगा गई हड्डियां वापस नहीं आती
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