सोमवार, 31 मई 2021

गंगा गई हड्डियां

गलत कहते थे लोग

कि गंगा गई हड्डियां वापस नहीं आती

 

समय बदल रहा है

अब लाशें ढूंढ रही हैं

चार कंधे, कुछ लकड़ियां

और अनंत काल से ढूंढे जाने वाली 

दो गज जमीन

 

ढूंढने की इस कवायद को

लग्जरी का टैग दिया गया है

और जो लाशें 

इतनी रसूखदार ना हो

कि वो अपने लिए

यह इंतजाम कर सकें

वो अपने आप को कर देती हैं 

यूं ही गंगा के हवाले...

हड्डियां बनने का

इंतजार किए बगैर

 

पर गंगा को

शायद रास नहीं आया

पूरी की पूरी

लाशों का भार

आखिर अभी तक

उस पर सिर्फ

हड्डियों की ही तो

जिम्मेदारी थी

 

थकी हारी गंगा

दोबारा उन लाशों को

खींचती, घसीटती, बहाती 

और आखिरकार बेबस, लाचार

अपने अख्तियार से बाहर 

कर देती इस जिम्मेदारी को अस्वीकार 

और निकाल देती उन मुर्दा शरीरों को 

अपने पानी से बाहर

 

गंगा को कहां पता था

उसके किनारे भी

बह आई इन लाशों पर 

कशमकश में पड़ जाएंगे 

वारिसों की ठुकराई लाशों को

किस राज्य की तरफ भेजें

इस पर भी भ्रम में जाएंगे 

 

जहां जिंदा लोगों की

सांसों के बाजार में

बोली लगाई जाएगी

वहां खामोश, फूली

लाशों की व्यथा 

किसे नज़र आएगी 

 

बिना रसूख वाली 

ये लाशें

नहीं दे पाएंगी

अपनी अर्जी

किसी भी मानव अधिकारों के 

पैरोकार को

 

अधिकारों की आवाज,

अगर उठती भी है,

तो वह सिर्फ हाजिर-नाजिर 

शख्स की ही उठती है

सिर्फ लाशों की

हाजरी काफी नहीं है 

दफनाने या जलाने का

सम्मान हासिल करने के लिए

 

सही ही तो है

अब समय बदल रहा है...

बिना वारिसों वाली 

गंगा गई लाशें

वापस रही है...

दोबारा इस फानी संसार में

 

गलत कहते थे लोग 

कि गंगा गई हड्डियां वापस नहीं आती

 

© उपमा डागा २०२१

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

खामोशियाँ

कुछ खामोशियाँ अच्छी लगती हैं,
फ़ोटो: एलिज़बेथ हागन
अपने आप में सिमटी,
बिना कहे कुछ कहती,
जरा रुकी-रुकी, ठहरी-ठहरी,
कभी इक मुस्कान सी लाती,
कभी आँख नम करती,
महज खुद को जीती,
कुछ खामोशियाँ अच्छी लगती हैं...

कुछ खामोशियाँ चुप सी रहती हैं,
अपने होने से डरती,
सवालों जवाबों से बचती,
स्याह अंधेरों में भटकती,
बीती बातों में कहीं उलझी,
उदास ख़त की तरह हँसती,
बस कटने के लिए कटती,
सिर्फ अपने नाम को जीती,
कुछ खामोशियाँ चुप सी रहती हैं...

© उपमा डागा २०१४

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

रास्ते के साथी

कुछ अजीब से बशर हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
ना वो रकीब हैं, न हबीब हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
न उन्हें कुछ दरकार मुझसे,
ना मुझे कोई ख्वाहिश,
फिर भी वो हमकदम हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
सोचों में कोई गुम है,
कोई मुस्कुरा रहा है,
अश्कों को भी पी रहे है,
मेरे रास्ते के साथी।
फिर मिलने का किसी से,
कोई वादा नहीं किया है,
आवाज़ दे के क्यों बुलाए,
मेरे रास्ते के साथी।
कभी जिंदगी से यूं ही,
जब मायूस बैठ जाएँ,
जीने का हुनर भी सिखाए,
मेरे रास्ते के साथी।

© उपमा डागा २०१३

सोमवार, 25 नवंबर 2013

तल्ख़ियां

कुछ तो मजबूरियां इन साँसों की भी रही होगी,
यूं ही कोई किसी पे एहसां नहीं करता।

एक दस्तूर की तरह ज़िंदगी को जिए जा रहे है हम,
वरना इस जहाँ में रहने को अब मन नहीं करता।

हदों की बोली इक रोज जरा हमको भी समझा दो,
यह शहर हमारी बेतकल्लुफी पसंद नहीं करता।

बुतों के इस मुल्क के अजब रिवाज़ों के सदके,
अब यह दिल खोने पे कभी रंज नहीं करता।

तेरी दोस्ती की हकीकत जो मैं लोगों को बताता,
कोई भी आज हमें बेवफाई के तंज नहीं करता।

हर शख्स की आँख नम है और होठों पे बेबसी,
फिर भी दिल की चोटों की वो मरहम नहीं करता।

ए काश कि जीने की कोई आसां सी सूरत होती,
इस जमीं पे तब कोई, जन्नत जन्नत नहीं करता।

© उपमा डागा २०१३


गुरुवार, 6 जून 2013

युग परिवर्तन

बदली परिभाषाओं में,
हे कृष्ण! तुझे फिर से आना होगा,
रिश्तों में उलझे पार्थ को,
फिर से गीता का मर्म समझाना होगा।

अभिमन्यु को समय के अभेद,
चक्रव्यूह में जाना सिखाना होगा,
पर बाहर आने के भेद के लिए,
हे लीलाधर! सुभद्रा को जगाना होगा।

कहीं फिर से सकुचाती दुल्हन,
द्रौपदी, पांचाली न बन जाये,
माँ कुंती को इस बार हे मुरलीधर!
बोलने से पहले चुप करवाना होगा।

सदियों से वो 'सूर्यपुत्र' भील बन के,
माँ की ममता को तरसा है,
इस युग में हे गिरिधर!
तुम्हें कर्ण को इन्साफ दिलवाना होगा।

माना कि गुरु द्रोणाचार्य के लिए,
अर्जुन सर्वश्रेष्ट है, महान है,
पर इस बार हे केशव! एकलव्य का
अंगूठा भी कटने से बचाना होगा।

द्रोपदी की आबरू बचाने के लिए,
हे माधव! तेरा आना तेरा धर्म ही सही,
पर पत्नी को वस्तु की तरह दाव पर लगाने पर 
अब धर्मराज को भी धर्म का सही राह बताना होगा।

एक युग से राजा की सेवा में रत,
भीष्म को अच्छे बुरे का भेद बताना होगा,
राज्य से पहले अब गंगा पुत्र को 
हे सर्वपालक! पितामह बन के दिखाना होगा।
 
हे वासुदेव! अब देखना द्रोपदी कहीं फिर से,
'अँधे का पुत्र अँधा' कह के हँस न दे,
अब उसे शब्दों के बाण लगने की,
व्यथा का परिणाम पहले से ही बताना होगा।

हे चक्रधर! सदियों से उलझे इस ताने बाने की,
इक-इक गाँठ और इक-इक उलझन को,
प्यार की मरहम से, हल्के हाथों से खोलकर,
अब नए युग का महाभारत होने से बचाना होगा।

© उपमा डागा पार्थ २०१३