बुधवार, 19 दिसंबर 2012

जिन्दा लाशें

सड़क के किनारे पड़ी,
दो जिन्दा लाशें,
खून से लथपथ,
नंगी,
ठण्ड से ठिठुरती, 
अँधेरे कोने में पड़ी,
इंतजार कर रहीं थी—

अपने जिन्दा होने के सबूत का या 
किसी इंसान के गुजरने का।

जो तार-तार दामन को,
फिर से जोड़ जाए,
नंगे से जिस्मों को,
शर्म का पर्दा ओढ़ा जाए,
नोचते, खसोटते वहशियों की,
यादों को मिटा जाए।

बस कुछ ही देर पहले—

दो हाथ, कुछ वादे,
निश्छल हंसी, मुस्कुराते चेहरे,

सब थे, आस पास ही—

फिर अचानक,
घिनौनेपन का तांडव,
अस्मत को रौंदने लगा,
एक एक करके कई बार,
उसपे जब्रो-सितम तोड़ने लगा।

उसकी चीखो पुकार
बंद दरवाज़ों में ही घुटने लगी,
वो लुटी हुई इज्जत भी,
बार बार फिर लुटने लगी।

आँखों के कोनों से,
जब आंसू सूखने लगे,
और दरिंदों के खुद के ही,
हौंसले जब टूटने लगे,
खोखले शरीरों में तब,
चंद सांसों का जहर रहने दिया,
कहने को उन जानवरों ने, 
उनको जिन्दा भी रहने दिया।

वो पड़े-पड़े न जाने कब तक, 
खुद से ही शर्मसार होते रहे,
लहू के निशानों को 
अपने आंसूओं से ही धोते रहे।

अब खामोशियों से सब,
उनके जख्मों को हैं सहला रहें,
गली, कुचों, सड़कों और  
संसद में भी आवाज़ हैं उठा रहें—

पर मौत से लड़ती 'वो'
क्या कभी सच में 
'जिन्दा' हो पाएगी?
पहले की तरह 'वो'
कभी बेख़ौफ़ घूम पाएगी?
होठों पे कभी 'वो'
प्यारी सी मुस्कान ला पाएगी?
मिल गई जो उसको सांसे,
तो क्या अपना ही बोझ उठा पाएगी?

रविवार (१६ दिसम्बर २०१२) को एक लड़की और उसके साथी पर हुए हमले, फिर उस लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार ने एक बार फिर प्रश्नचिन्ह लगा दिया दिल्ली जैसे शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर। तब से लगातार हर जगह इसकी चर्चा हो रही है, निंदा हो रही है, दोषियों को सजा देने की बातें हो रहीं हैं। पर जहाँ सुरक्षा एक मुद्दा है वहां एक और गंभीर मुद्दा भी है—उस पीड़ित लड़की का इस हादसे की परछाईओं से बाहर निकलना, इस समाज और व्यवस्था पर दोबारा से विश्वास कर पाना, और सबसे ज्यादा जरूरी खुद पे पहले सा भरोसा कर पाना।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

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