रविवार, 27 जनवरी 2013

समीक्षा

गणतंत्र दिवस की संध्या पर, 
आओ करे सविंधान की समीक्षा 
कानून कितना लोगों का है,
लें अपनी और इसकी परीक्षा।

धाराएँ इसमें बनती गई,
धाराएँ ही जुड़ती गई,
और नियमों की तलाश में 
जनता, धारा बन बहती गई।

कानून के रखवाले ही, 
इसकी अस्मत को रौंदते है,
हर नए जुर्म के लिए 
पुराने नियमों को तोड़ते हैं।

कसाब की फांसी के लिए,
हम संविधान की पोथी खोलते हैं,
बचाव पक्ष की दलीलें सुन 
हम कानून की बोली बोलते हैं। 

नियमों की पहरेदारी में,
हम अपराधियों को बचाते है,
किसी मासूम की बेबसी पर,
स्वार्थ की रोटियां पकाते हैं।

बलात्कारी भी इस देश में,
रुआब से खुला फिरता है,
और दीन-हीन सा कानून,
मुंह छुपाये फिरता है। 

धाराओं के समन्दर को, 
अब तूफ़ान की जरूरत है,
बीते हुए 'कल' की जर्जरता को,
'आज' की संबलता की जरूरत है।

जुर्म की हर परिभाषा को,
दायरे में बंद करवाना है,
मासूमियत को हर रोज,  
कुचलने से भी बचाना है। 

क्यों न जनता के कानून को,
जनता से ही लिखवाया जाये,
लेकिन, किन्तु, परन्तु की जटिल 
बेड़ियों से आजाद करवाया जाये।

फिर लोकतंत्र हमारा यह, 
सच में 'लोगों का तंत्र' बन जायेगा,
और गणतंत्र दिवस मनाने का, 
सरूर भी तभी आएगा।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

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