छोटी होती सिगरेट
का आखिरी कश...
वही छल्ले,
वही धुँआ,
वही आ के आखिर में,
'कुछ और' की तलब,
वही राख का गिरना,
वही उस गिरने से,
कुछ जलने को बचाना,
वही उस गुबार में समा के,
फिर से वापिस,
इसी दुनिया में आना...
सिगरेट ने भी आखिर तक,
अपनी फितरत न बदली,
क्यों वो हर बार मेरी तरह,
बनने की कोशिश है करती रहती।
© उपमा डागा पार्थ २०१३
सच के बहुत करीब से बैठ कर लिखना शायद असं नही होता है पर उपमा जी अपने लिखा .....................यही सच है
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