बुधवार, 23 मई 2012

एहसास

मिट्ठी, यह नाम लेते ही हमारे मुंह में एक मिठास सी घुल जाती है। आज उसी की बारहवी सालगिरह पर उसे तोफहे में क्या दें बस इसी कशमकश में थी कि ख्याल आया कि कुछ ऐसा देना चाहिए जो सदैव उसके पास रहे। चंद शब्दों को बटोर कर उसके लिए एक सपना बुना है... और अब वो समय आ गया है जब शब्दों के मायने उसको समझ आने लगेगें।
मेरी बेटी के लिए एक तोहफा (24 मई  2012):

दुआएं तो बिना बोले सारी ही तुम्हारी है,
फिर भी चंद सतरें कागज पे उतारी हैं,
कुछ मुस्कुराहटें जो मैंने उम्र भर में कमाई है,
वो साथ रहे तेरे ज्यों तेरी ही परछाई है,
मैं चाँद न तारे कभी तेरे लिए ला पाऊंगी,
पर जीवन की दुपहरी में कभी छोड़ के न जाऊंगी,
मेरे बस में अगर होता तुझे आँखों में छुपा लेती,
तेरे सारे ग़मों को मैं हसीं में बदल देती,
मेरे अशार तुझे शायद अब न समझ आयेंगे,
पर शायद यह कभी तुम्हें जिन्दगी के मायने समझाएंगे,
तुम इनको वक़्त की कसौटी पे रख के देख लेना,
इन खट्टे मीठे लफ्जों को कभी यूं ही चख के देख लेना,
कभी यह बन के तेरे हमराज तेरे साथ ही हो लेंगे,
कभी मेरी छुअन बन के तुझे प्यार से यह चूमेंगे,
कभी आ के रातों में तुझे सहला के सुला देंगे,
कभी मेरी तरह आ के तुझे नींद से जगा देंगे,
कभी बस ऐसे ही आ के वो तुझ से लिपट जायेंगे,
हम हैं! बस चुपके से यह एहसास करवा जायेंगे,
हम हैं! बस चुपके से यह एहसास करवा जायेंगे!

© उपमा डागा पार्थ २०१२

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