शनिवार, 28 दिसंबर 2013

रास्ते के साथी

कुछ अजीब से बशर हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
ना वो रकीब हैं, न हबीब हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
न उन्हें कुछ दरकार मुझसे,
ना मुझे कोई ख्वाहिश,
फिर भी वो हमकदम हैं,
मेरे रास्ते के साथी।
सोचों में कोई गुम है,
कोई मुस्कुरा रहा है,
अश्कों को भी पी रहे है,
मेरे रास्ते के साथी।
फिर मिलने का किसी से,
कोई वादा नहीं किया है,
आवाज़ दे के क्यों बुलाए,
मेरे रास्ते के साथी।
कभी जिंदगी से यूं ही,
जब मायूस बैठ जाएँ,
जीने का हुनर भी सिखाए,
मेरे रास्ते के साथी।

© उपमा डागा २०१३

सोमवार, 25 नवंबर 2013

तल्ख़ियां

कुछ तो मजबूरियां इन साँसों की भी रही होगी,
यूं ही कोई किसी पे एहसां नहीं करता।

एक दस्तूर की तरह ज़िंदगी को जिए जा रहे है हम,
वरना इस जहाँ में रहने को अब मन नहीं करता।

हदों की बोली इक रोज जरा हमको भी समझा दो,
यह शहर हमारी बेतकल्लुफी पसंद नहीं करता।

बुतों के इस मुल्क के अजब रिवाज़ों के सदके,
अब यह दिल खोने पे कभी रंज नहीं करता।

तेरी दोस्ती की हकीकत जो मैं लोगों को बताता,
कोई भी आज हमें बेवफाई के तंज नहीं करता।

हर शख्स की आँख नम है और होठों पे बेबसी,
फिर भी दिल की चोटों की वो मरहम नहीं करता।

ए काश कि जीने की कोई आसां सी सूरत होती,
इस जमीं पे तब कोई, जन्नत जन्नत नहीं करता।

© उपमा डागा २०१३


गुरुवार, 6 जून 2013

युग परिवर्तन

बदली परिभाषाओं में,
हे कृष्ण! तुझे फिर से आना होगा,
रिश्तों में उलझे पार्थ को,
फिर से गीता का मर्म समझाना होगा।

अभिमन्यु को समय के अभेद,
चक्रव्यूह में जाना सिखाना होगा,
पर बाहर आने के भेद के लिए,
हे लीलाधर! सुभद्रा को जगाना होगा।

कहीं फिर से सकुचाती दुल्हन,
द्रौपदी, पांचाली न बन जाये,
माँ कुंती को इस बार हे मुरलीधर!
बोलने से पहले चुप करवाना होगा।

सदियों से वो 'सूर्यपुत्र' भील बन के,
माँ की ममता को तरसा है,
इस युग में हे गिरिधर!
तुम्हें कर्ण को इन्साफ दिलवाना होगा।

माना कि गुरु द्रोणाचार्य के लिए,
अर्जुन सर्वश्रेष्ट है, महान है,
पर इस बार हे केशव! एकलव्य का
अंगूठा भी कटने से बचाना होगा।

द्रोपदी की आबरू बचाने के लिए,
हे माधव! तेरा आना तेरा धर्म ही सही,
पर पत्नी को वस्तु की तरह दाव पर लगाने पर 
अब धर्मराज को भी धर्म का सही राह बताना होगा।

एक युग से राजा की सेवा में रत,
भीष्म को अच्छे बुरे का भेद बताना होगा,
राज्य से पहले अब गंगा पुत्र को 
हे सर्वपालक! पितामह बन के दिखाना होगा।
 
हे वासुदेव! अब देखना द्रोपदी कहीं फिर से,
'अँधे का पुत्र अँधा' कह के हँस न दे,
अब उसे शब्दों के बाण लगने की,
व्यथा का परिणाम पहले से ही बताना होगा।

हे चक्रधर! सदियों से उलझे इस ताने बाने की,
इक-इक गाँठ और इक-इक उलझन को,
प्यार की मरहम से, हल्के हाथों से खोलकर,
अब नए युग का महाभारत होने से बचाना होगा।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

कब तक?

काश उद्धार की कोई हल्की सी आशा ही नज़र आए...

अब तो लहू भी रिस रिस के जम सा गया है
जनता का आवेश भी मानों थम सा गया है।

कल की तरह वो आज भी चीत्कार रही है
संभलो! कि बेटी तुम्हें अब भी पुकार रही है।

कुछ तो इन रक्तबीजों की गिनती में कमी आए,
कोई आ के इनको मर्यादा के मायने समझाए।

नारी और भोग्या में अंतर समझ में आए,
या इनकी मृतप्राय आत्मा को ही होश में लाए।

बेशक फिर से लौट के सतयुग न चाहे आए,
पर यह धरती सरक के रसातल में तो ना जाए...

© उपमा डागा पार्थ २०१३

रविवार, 21 अप्रैल 2013

बेटी

चलो आओ कि
दफ़ना आए उसे...

इससे पहले कि
घर की दीवार
कमजोर हो जाए,
सड़क पे चलना
भी मुहाल हो जाए,
सिर्फ वहशियों का
यह समाज हो जाए,
कानूनों की बैसाखी
से भी वार हो जाए।
चलो आओ कि
दफ़ना आए उसे…

इससे पहले कि
माँ की ममता का,
कत्लेआम हो जाए,
बाप का ढाढ़स
सरे-आम नीलाम हो जाए,
भाई की राखी से
भी सवाल हो जाए,
हंसी की खनक की जगह
चीखों-पुकार हो जाए।
चलो आओ कि
दफ़ना आए उसे…

इससे पहले कि
मद्दम धुंधलाती रोशनी
भी अंधकार हो जाए,
थके, टूटे, कमजोर कदम
भी लाचार हो जाए,
घटती बढ़ती सिसकियाँ
भी काली नाद हो जाए,
अवशेषों में बचा इंसान
भी खूँखार हो जाए,
चलो आओ कि
दफ़ना आए उसे…

क्यों जन्म दे कर उसे
जिन्दगी के रंग दिखाए,
“बड़ी सुहानी है यह दुनिया”
यह पाठ उसे हम पढ़ाए,
कंकालों की बस्ती में
इंसानियत के गीत सुनाए,
सुरक्षा के नाम पर
जब सब गूंगे बहरे हो जाए,
तो अच्छा है कि
दफ़ना आए उसे...

© उपमा डागा पार्थ २०१३

रविवार, 31 मार्च 2013

नींद

दिन भी आज
चादर ओढ़े बैठा है,
मानों
खुद चमकते चमकते
थक गया हो।

और माँग रहा हो
इक नींद उधार रात से,

और रात खामोश है
रोज की तरह,
क्योंकि वो जानती है,
न तो वो दिन को
एक मीठी नींद दे पाएगी,
और न ही सदियों के अँधेरों से,
कभी खुद ही निकल पाएगी...

© उपमा डागा पार्थ २०१३

शनिवार, 9 मार्च 2013

शीतलहर

रोज छपती है
अखबारों में
शीतलहर से
मरने वालों की ख़बरें...

रूहों की कंपकपाहट मगर
किसी ने भी नापी नहीं...
© उपमा डागा पार्थ २०१३

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

आग और धुँआ

आग—
एहसास दिलाती है,
मौसम के मिजाज़ का,
गर्मी में अपने शोलों का,
और सर्दी में अपनी तपिश का।

लेकिन धुँआ—
हर मौसम में सिर्फ,
दम घोंटता है,
बिना सर्दी गर्मी की
परवाह किये हुए।

तो बेहतर है—
आग को
एक ही बार झेलना,
या एक ही बार
सब स्वाह कर लेना।

बजाय इसके कि
हर बार उसी धुंए
के गुबार में जीना,
या साँसों को बस
चलने का नाम देना।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

हँसते लफ़्ज़

आज कुछ मुस्कुराहटों की बात की जाए,
माहौल की उदासी तो कुछ कम की जाए।

बड़ी सहमी-सहमी सी हो गई जिंदगी इन दिनों ,
तेरी बाँहों के घेरे की बात की जाए।

शिकवे शिकयतों के दौर तो यूँ ही चलते रहेंगे,
अब कुछ मिलने मिलाने की बात की जाए।

इक अरसे से सिर्फ साँसों को हमने जीने का नाम दिया,
अब दिल से जीने की बात की जाए।

जोड़-तोड़ की गांठों से अब उठने लगी है टीस सी,
दोस्ती यारी के मरहम की बात की जाए।

दुखती नज्मों से दिल यह काफी बोझिल है,
अब सिर्फ हँसते लफ्ज़ों की बात की जाए।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

सिगरेट और मैं

छोटी होती सिगरेट
का आखिरी कश...

वही छल्ले,
वही धुँआ,
वही आ के आखिर में,
'कुछ और' की तलब,
वही राख का गिरना,
वही उस गिरने से,
कुछ जलने को बचाना,
वही उस गुबार में समा के,
फिर से वापिस,
इसी दुनिया में आना...

सिगरेट ने भी आखिर तक,
अपनी फितरत न बदली,
क्यों वो हर बार मेरी तरह,
बनने की कोशिश है करती रहती।

© उपमा डागा पार्थ २०१३

रविवार, 27 जनवरी 2013

समीक्षा

गणतंत्र दिवस की संध्या पर, 
आओ करे सविंधान की समीक्षा 
कानून कितना लोगों का है,
लें अपनी और इसकी परीक्षा।

धाराएँ इसमें बनती गई,
धाराएँ ही जुड़ती गई,
और नियमों की तलाश में 
जनता, धारा बन बहती गई।

कानून के रखवाले ही, 
इसकी अस्मत को रौंदते है,
हर नए जुर्म के लिए 
पुराने नियमों को तोड़ते हैं।

कसाब की फांसी के लिए,
हम संविधान की पोथी खोलते हैं,
बचाव पक्ष की दलीलें सुन 
हम कानून की बोली बोलते हैं। 

नियमों की पहरेदारी में,
हम अपराधियों को बचाते है,
किसी मासूम की बेबसी पर,
स्वार्थ की रोटियां पकाते हैं।

बलात्कारी भी इस देश में,
रुआब से खुला फिरता है,
और दीन-हीन सा कानून,
मुंह छुपाये फिरता है। 

धाराओं के समन्दर को, 
अब तूफ़ान की जरूरत है,
बीते हुए 'कल' की जर्जरता को,
'आज' की संबलता की जरूरत है।

जुर्म की हर परिभाषा को,
दायरे में बंद करवाना है,
मासूमियत को हर रोज,  
कुचलने से भी बचाना है। 

क्यों न जनता के कानून को,
जनता से ही लिखवाया जाये,
लेकिन, किन्तु, परन्तु की जटिल 
बेड़ियों से आजाद करवाया जाये।

फिर लोकतंत्र हमारा यह, 
सच में 'लोगों का तंत्र' बन जायेगा,
और गणतंत्र दिवस मनाने का, 
सरूर भी तभी आएगा।

© उपमा डागा पार्थ २०१३