बुधवार, 19 दिसंबर 2012

जिन्दा लाशें

सड़क के किनारे पड़ी,
दो जिन्दा लाशें,
खून से लथपथ,
नंगी,
ठण्ड से ठिठुरती, 
अँधेरे कोने में पड़ी,
इंतजार कर रहीं थी—

अपने जिन्दा होने के सबूत का या 
किसी इंसान के गुजरने का।

जो तार-तार दामन को,
फिर से जोड़ जाए,
नंगे से जिस्मों को,
शर्म का पर्दा ओढ़ा जाए,
नोचते, खसोटते वहशियों की,
यादों को मिटा जाए।

बस कुछ ही देर पहले—

दो हाथ, कुछ वादे,
निश्छल हंसी, मुस्कुराते चेहरे,

सब थे, आस पास ही—

फिर अचानक,
घिनौनेपन का तांडव,
अस्मत को रौंदने लगा,
एक एक करके कई बार,
उसपे जब्रो-सितम तोड़ने लगा।

उसकी चीखो पुकार
बंद दरवाज़ों में ही घुटने लगी,
वो लुटी हुई इज्जत भी,
बार बार फिर लुटने लगी।

आँखों के कोनों से,
जब आंसू सूखने लगे,
और दरिंदों के खुद के ही,
हौंसले जब टूटने लगे,
खोखले शरीरों में तब,
चंद सांसों का जहर रहने दिया,
कहने को उन जानवरों ने, 
उनको जिन्दा भी रहने दिया।

वो पड़े-पड़े न जाने कब तक, 
खुद से ही शर्मसार होते रहे,
लहू के निशानों को 
अपने आंसूओं से ही धोते रहे।

अब खामोशियों से सब,
उनके जख्मों को हैं सहला रहें,
गली, कुचों, सड़कों और  
संसद में भी आवाज़ हैं उठा रहें—

पर मौत से लड़ती 'वो'
क्या कभी सच में 
'जिन्दा' हो पाएगी?
पहले की तरह 'वो'
कभी बेख़ौफ़ घूम पाएगी?
होठों पे कभी 'वो'
प्यारी सी मुस्कान ला पाएगी?
मिल गई जो उसको सांसे,
तो क्या अपना ही बोझ उठा पाएगी?

रविवार (१६ दिसम्बर २०१२) को एक लड़की और उसके साथी पर हुए हमले, फिर उस लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार ने एक बार फिर प्रश्नचिन्ह लगा दिया दिल्ली जैसे शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर। तब से लगातार हर जगह इसकी चर्चा हो रही है, निंदा हो रही है, दोषियों को सजा देने की बातें हो रहीं हैं। पर जहाँ सुरक्षा एक मुद्दा है वहां एक और गंभीर मुद्दा भी है—उस पीड़ित लड़की का इस हादसे की परछाईओं से बाहर निकलना, इस समाज और व्यवस्था पर दोबारा से विश्वास कर पाना, और सबसे ज्यादा जरूरी खुद पे पहले सा भरोसा कर पाना।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

रुकी हुई सी ज़िन्दगी

जिन्दगी ने आज हमको उस मुकाम पे ला छोड़ा है,
तू भी तिल-तिल कर मरता है, मैं भी तिल-तिल कर जीती हूँ।

कुछ पन्ने पलट के जो देखे, हमने यह अफ़साना पाया,
कुछ टूट गया, कुछ छूट गया, कुछ लिखती हूँ, कुछ सिलती हूँ।

अब रात की स्याही ख़त्म हुई और दिन ने भी मुँह फेर लिया,
इस पहर को अब मैं क्या नाम दूं, बस इसी सोच में रहती हूँ।

गए वक़्त का दामन छोड़ दिया, अब नए ने भी कुछ ऐसा मोड़ लिया,
मैं बैठी कब से इस दोराहे पे, रस्ता चुनने से डरती हूँ।

कुछ रिश्तों ने हमको बांध लिया, जीने का वादा भी ले ही लिया।
अब उनके लिए मैं रुकी हुई इक-इक सांस बचाती हूँ, कई मुस्कान चुराती हूँ।


© उपमा डागा पार्थ २०१२

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

गुनगुनी धूप

अपने सपनों के लिए कोई बड़ा जहाँ नहीं चाहिए,
कोई नया सूरज, कोई चाँद तारे नहीं चाहिए।

छोटी-छोटी ख्वाहिशों के संदूक मैं भरती गयी,
बस अब उस की चाबी भी कहीं तो मिलनी चाहिए।

छज्जे पे रखी हसरतें ठण्ड से सिल गयी होंगी,
अब तो उनके लिए बस धूप गुनगुनी चाहिए।

बरसों से रखे खतों की लिखावट भी धुंधली पड़ गयी,
अब तो इन पीले पन्नों के लिए नयी स्याही चाहिए।

जज्बातों के गस्से थाली में रखे रखे पानी हो गए,
इनको जिलाने के लिए एक अंगीठी का धुआं भर चाहिए।

© उपमा डागा २०१२

दूरियाँ

सपने और आंसू दोनों आज आँखों से जुदा हैं,
इस बड़े शहर ने क्या-क्या न छुड़वाया हमसे।

सिली सी धूप भी बस छतों की हो के रह गई,
लम्बे होते मकानों ने इस नेमत को चुराया हमसे।

गाँव की पगडण्डी आज भी मायूस सी राह तकती है,
कोलतार की सड़कों ने अपनी मिट्टी को दूर करवाया हमसे।

कुओं का पानी जाने कब जा के बोतल में बंद हो गया,
मिनरल वाटर ने ताज़े पानी का स्वाद भुलाया हमसे।

शादी की हँसी ठिठोली फार्म हाउस में कहीं खो गई,
डी जे के शोर ने ठुमकते गीतों को जुदा करवाया हमसे।

खैरो-खबर के लिए फेसबुक अकाउंट ही अब काफी है,
इस लत ने खतो-खतूत का नाता तुड़वाया  हमसे।

कभी रस्ते में मिले तो पहचान लेना मुझको,
यहाँ की दूरियों ने कई रिश्तों को जुदा करवाया हमसे।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

रिश्ते

रिश्तों की भूलभुलैयों में हम इक मुद्दत से उलझे बैठे हैं,
कभी नामों के नश्तर चुभते है, कभी पहचान को तरसते रहते हैं।

इतने चुप से आ के वो सांसों की रवायत बन जाते हैं,
कभी धड़कन थमने से पहले, बन गर्द हवा में मिल जाते हैं।

महफ़िल में और तन्हाई में यह रूप बदलते रहते हैं,

कभी होठों पे आ के सजते हैं, कभी पलकों में रच बस जाते हैं।

कुछ अजब सी है फितरत इनकी, कुछ अलग अंदाज़ लिए यह रहते हैं,
जीने की वजह कभी बनते हैं, मरने का सबब भी बन जाते हैं।

फिर वक़्त के दरिया में यह खुद को तूफानों में भी परखते हैं,
कुछ अल्फाज़ बन के निकलते हैं, तो कुछ जीते जी कट जाते हैं।

© उपमा डागा २०१२

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हौसला

अपने रंजों गम की स्याही जो हमने पोंछी तो,
काजल की डिबिया सा दुनिया का अक्स नज़र आया।

परवाज़ हूँ मैं, हर हाल में उड़ना है मेरी फितरत,
घायल था वो परिंदा पर यही गाता नज़र आया।

हौंसला परखने को जब समंदर ने तूफां को पुकारा,
साहिल की तमन्ना थी, जो इक तिनका नज़र आया।

तन्हाईयों से घबरा के जो काफिला भीड़ का पकड़ा,
साथ चलता हर इक शक्स बेबस सा नज़र आया।

जिन्दगी ने कई पन्नों पे इक सवाल को दोहराया,
पर हर बार उसका जवाब मुख्तलिफ़ ही नज़र आया।

ख्वाबों और हकीकत का राफ्ता अभी न हो तो न सही,
क्या होगा वो आलम जब यह मंजर कभी नज़र आया।

शिकस्तों से घबरा के जो दम तोड़ने लगी हँसी,
सूली पे लटकता ईसा का चेहरा नज़र आया।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

९ से ५

शहर भर के परिंदे न जाने कहाँ गए,
शायद अब वो भी घड़ी की सुईयाँ देख के उड़ा करते हैं।

एहसास, तम्मना, जिन्दादिली और चाहत,
जिन्दा हैं सभी शब्द, पर कहानियों में मिला करते हैं।

फिज़ा भी पेड़ों पे अब भूले से कभी आती है,
खिलते तो हैं कुछ फूल, पर डर-डर के खिला करते हैं।

बसों के आने जाने सा यह घटता बढ़ता साँसों का शोर,
सुनते तो हैं रोज पर महसूस कम ही किया करते हैं।

९ से
५ की जिन्दगी में सब यूं उलझ के बैठे हैं,
हँसते तो हैं रोज पर राशन पे हँसा करते हैं।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

ताआरुफ़

चंद लफ्ज़ जो तुमको मेरे बारे में बताएं,
धुंधला सा इक अक्स कहीं जेहन में बन जाएं,
हर एक मेरा पहलू मेरे ताआरुफ़ में समा जाएं,
कुछ सतरों में जज़्बात मेरे सारे ही बंध जाएं।

जो सोच के कुछ हम अपने बारे में बता पाते,
तो कब से हम खुद को खुद से मिलवा पाते,
ए काश! हम इंसा को लफ़्ज़ों में बांध पाते,
तो जिन्दगी को हमेशा हम सुलझा हुआ ही पाते।

लफ़्ज़ों से परे जब कभी मैं पास तेरे आऊँगी,
इक आँसू की तरह कभी मैं आँख से बह जाऊँगी,
इक हंसी की तरह कभी मैं  होठों पे ठहर जाऊँगी,
इक सोच की तरह कभी साथ ही तेरे रह जाऊँगी।

तब मुझको तुम अपनी तरह से भी जान लेना,
मेरे लफ़्ज़ों को बेशक तुम कोई नया नाम देना,
मेरी सोच को समझ कर कुछ तुम भी कह ही देना,
और फिर मुझसे भी तुम मेरा ताआरुफ़ भी करवा देना।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

शनिवार, 29 सितंबर 2012

इंतज़ार है मुझे

मायने आजादी आज फिर मुख्तलिफ है,
कल देश को थी आज हमको ही अपनी जरूरत है,
इक आजादी हमने कई शहादतों से पाई है,
इक गुलामी के चलते अब तो जान पे बन आई है।

तब बंटी थी सीमाएं और दिल थे छलनी हुए,
उस समय के घाव जो थे वो न अब तक भरे,
मजहब के सीने में चुभा था जो खंज़र उस समय,
आज भी दूर तक उसके खून के कतरे मिले।

दम भर जो बैठे अपने सारे गीले, सूखे ज़ख्म लिए,
चीन के हमले से फिर कुछ नए नश्तर चुभे,
दर्द और धोखे की फ़हरिस्त और लम्बी हो गई,
हिन्दोस्तां के माथे पे हार के भी कंकर लगे।

रफ्ता रफ्ता फिर भी हम जिन्दगी की रौ में बह गए,
चोट जो दिल पे लगी थी उसको हँस के सह गए,
माझी की दुश्वारियां तब बस किस्से बन के रह गए,
सुनहरे मुस्तकबिल के सपने आँखों में बस के रह गए।

और पहले तो फटे चाक हमने सब रफू किये,
दुश्मनों के दिए जख्मों से भी कई सबक लिए,
दोस्ती के रूप को भी हमने नए मायने दिए,
अपनी रक्षा को भी कुछ बेहतर आयाम दिए।

दूध की किल्लत का नामोनिशां ही हमने मिटा दिया,
खेतो में चलते थे जो हल उनको ही ताकत अपनी बना लिया,
ला के कुछ तबदीलियाँ इसका नक्शा ही बदल दिया,
दुनिया के परदे पे इसको एक नया मुकाम दिया।

आज सोचो तो मन इस बात से इतराता भी है,
पर खुली आँखों से इक और सच दिखलाता भी है,
आज के सरपरस्त बस व्यापारी बन के ही रह गए,
देश की जगह खुद के फायदे में ही उलझ के रह गए।

आज भी सड़कों पे भूखा बचपन है देखो रो रहा,
और देश का नौजवां नाउम्मीदी के फर्श पे है सो रहा,
स्वदेशी का नारा दूर कहीं पे तार तार है हो रहा,
और बाहर के मुल्कों का बोलबाला है हो रहा।

आज भी बेटे के जन्म पे मिठाईयां बांटी जाती है,
और बेटियों के पैदा होने पे चुप्पी सी छा जाती है,
आज भी निठारी जैसे किस्सों से गर्दन हमारी झुक जाती है,
और माँ बहनों की आबरू सरे आम ही लुटी जाती है।

क्या करे, कैसे करे, इन सवालों को फिर से दोहराना होगा,
अब तो अपने अन्दर जज्बातों का इक जलजला लाना होगा,
जंग लगी इन बेड़ियों को अब कही बहा कर आना होगा,
बरसों से जमे जवां खून में उबाल तो लाना होगा।

वो हसरतें जो हमने इस पाक सरजमीं के लिए सजाई थी,
वो आजादी जो हमने कई शहादतों के बाद पाई थी,
उस आजादी को आज पूरी तरह से पाना होगा,
मुद्दों की इस दलदल से इस देश को बाहर लाना होगा।

सोच की इन लहरों में जब यह तूफां आएगा,
तब ही सोये हुए इस वतन में इन्कलाब आएगा,
और धुंधला चुका सूरज चमक के सामने आ जायेगा,
शायद मायने आजादी भी तब ही समझ में आएगा।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

रविवार, 23 सितंबर 2012

मेरी बात

नए पुराने मौसम को मैं जी भर के जीती हूँ,
दिल खोल के खुद पे हँसती हूँ और बंद आँखों से रोती हूँ।
खवाबों की इस दुनिया में मेरा रोज का आना जाना है,
टूटी हुई चंद कतरनों से मैं नए ख्वाबों को बुनती हूँ।
रंगों के एक पिटारे को मैं पास हमेशा रखती हूँ,
मायूसी वाले लम्हों को खुशबाश रंगों से भरती हूँ।
दुनिया की भागमभागी में अपनी शर्तों पे चलती हूँ,
कभी चलते चलते रूकती हूँ, कभी रुकते रुकते चलती हूँ।
इस शोरोगुल के जंगल में मैं तन्हा सी भटकती हूँ, 
बस दिल की बातें सुनती हूँ और पन्ने काले करती हूँ।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

हसरतें

वो चाँद को पाने की हसरत,
वो फूलों को छूने की ललक।
वो गुड़िया की शादी की ख़ुशी,
वो छोटी मोटी कहा-सुनी।
वो दोस्तों के साथ हँसी मस्ती,
वो हर तरफ से बेफिक्री।
वो 'जल्दी आना' कहना मम्मी का,
वो मेरा कहना 'डोंट वरि'।
वो टूर से लौटना पापा का,
वो बैग टटोलना पापा का।
वो खुश होना एक पेन से भी,
वो उछल पड़ना कॉमिक्स से ही।
वो भाई बहनों की मीठी तकरार,
वो पापा की सचमुच की मार।
वो गाल सहलाना मम्मी का,
वो हमें समझाना मम्मी का।
वो रोते रोते सो जाना,
वो चुपके से आना पापा का।
वो सुबह मनाना पापा का,
वो स्कूल छोड़ के आना पापा का।
वो छोटी छोटी खुशियाँ थी,
वो छोटे छोटे आंसूँ थे।
वो छोटे छोटे सपने थे,
वो सब मेरे अपने थे।

वो सब अब बस चले गए!
अब उतनी जल्दी न हम हँस पायें,
न गीली हो आँखे जल्दी से।
अब रूठ तो जाएँ एक पल में,
पर माने जा के बरसों में।
कोई ऊँगली पकड़ के ले जाये मेरी,
मिलवा दे फिर से बचपन से।
कोई उंगली पकड़ के ले जाये मेरी ,
मिलवा दे फिर से बचपन से।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

रविवार, 19 अगस्त 2012

दहशत

मैं इसलिए परेशां हूँ,
क्योंकि मैं इक बेटी की माँ हूँ।

अब राक्षस सिर्फ साधु वेश में नहीं आते,
न ही वे बड़े-बड़े दांतों से हैं डराते।
बन के वो अपने, हमारे आस पास ही हैं मंडराते,
मौका लगते ही हमारे विश्वास का हरण कर जाते,
फिर छोटी सी मासूम हड्डियाँ हम निठारी में हैं पाते,
कुछ दिनों के लिए अख़बार की सुर्खियाँ बन जाते।

यह खबर सबके दिलों में इक हलचल तो मचाती है,
पर ठोस कदम के नाम पर इक चुप्पी सी छा जाती है।
धीरे-धीरे यह सुर्खियाँ बस केस बन के रह जाती हैं,
पहले की जगह खबर दुसरे पन्ने पे खिसक जाती है।
वो भावनाओं की जवालामुखी भी वक़्त पा के शांत हो जाती है,
और जिन्दगी फिर से वापिस इक रौ में आ जाती है।

समाज का घिनौनापन सब फिर से भूल जाते हैं,
और विश्वास के कटघरे में खुद को ही खड़ा पाते हैं।
रिश्तों की चादर ओढ़े यह कभी घर में घुस जाते हैं,
कभी गुरु के वेश में हम गुरुकुल में इनको पाते हैं।
बनके पड़ोसी यह कभी अपने जाल में फंसाते हैं,
और कभी यह अजनबी लालच से लुभाते हैं।

क्या करूँ अपनी बच्ची को मैं किस जगह ले जाऊँ ,
नन्हें से इस मोती को कौन सी सीप में छुपाऊँ।
यह हँसी, यह मासूमियत, मैं कैसे इनका खूं कराऊँ,
समाज के इन वहशियों से मैं उसको कब तक बचाऊँ,
हाथ पकड़ के कैसे मैं उसको हर जगह ले जाऊँ,
इन घिनौने चेहरों को मैं उसको क्यों कर दिखाऊँ।

सोचती हूँ मैं, आप भी कुछ तो सोचना,
दो पल के लिए समय निकाल के सोचना।
नन्हीं मासूम किलकारियों के लिए सोचना,
समाज की विशप्त तस्वीर सुधराने के लिए सोचना।
चाहे इनके लिए सतरंगी आसमां को न सोचना,
पर बेटियों का बचपन बचाने के लिए सोचना...

© उपमा डागा पार्थ २०१२


शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

पल-छिन

जीवन की भागादौड़ी में,
कुछ पल जो हमसे छूट गए,
वो पल जो हँसना चाहते थे,
कुछ हमसे कहना चाहते थे,
कुछ हमें सुनाना चाहते थे,
हमें पास बिठाना चाहते थे,
लफ्ज़ों को ताक पे रख के वो,
बस आँखें पढ़ना चाहते थे,
हाथों में हाथ पकड़ के बस,
कुछ महसूस करवाना चाहते थे,
सूरज की लाली में खुद को,
अन्दर तक डुबोना चाहते थे,
हवा के चंद झोकों के संग,
अठखेलियाँ करना चाहते थे।
वो पल अब कहीं चले गए
मैं तब भी काम में उलझा था,
मैं अब भी काम में उलझा हूँ,
न बीते हुए को बुलाता हूँ,
न आने वालों को संवारता हूँ,
आज भी उनकी आवाज़ को सुन,
बस यही मैं कहता रहता हूँ
तू चल, दम भर बैठ जरा, 
इक काम निपटा के आता हूँ...

© उपमा डागा पार्थ २०१२

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

मेरे अजनबी

बहुत दम भरते थे तुझे जानने का हम,
आज जाना तो लगा तुझे जानते ही नहीं।

हालातों की धुल सी यूं चेहरे पे पड़ गई,
देखा जो आइना तो लगा खुद को पहचानते ही नहीं।

तेरा हँसता सा चेहरा तो बस आँखों में बस गया,
इस चेहरे की हकीक़त को मगर हम पहचानते ही नहीं।

पूरा घर तो तुमने तस्वीरों से भर दिया,
ख़ाली है पर दिल का कोना लोग यह मानते ही नहीं।

जाने कहाँ तूने अपने अश्कों को बांधा है,
खुश्क आँखों के कोने यह राज जानते ही नहीं।

पानी का है बुलबुला यह पल भर में फूटेगा अब,
मालूम तो है यह हक़ीकत पर हम मानते ही नहीं।

हर कोई यहाँ खुद से इक जंग में उलझा है,
इसे सुलझाने की तरकीब मगर जानते ही नहीं।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

शनिवार, 30 जून 2012

कैंसर

कल फिर तेरी जगह रख खुद को सोचा मैंने,
दर्द के सेहरा में तन्हा खड़ा पाया मैंने,
हर ख़ुशी ज्यों एहसान करके आती है,
उनका वजूद भी बस पल भर का पाया मैंने,
बहुत शिकवे किये थे जिन्दगी से मगर,
अब उसी के लिए खुद को तड़पता पाया मैंने।

वो जो अपने थे मेरे या हबीब थे,
उनको रातों को खुदा से लड़ते हुए पाया मैंने,
मेरी मासूम सी बच्ची भी मौत के मायने समझने लगी,
बचपन का सौदा कर अपना जीवन गंवाया है मैंने,
अब तो बातें मेरी मेरे लिए ही अजनबी सी हो बैठी हैं,
जाने इस ख़ामोशी को क्या खो के है पाया मैंने।

मेरे बाद मुझे अपनी यादों में बुला लेना हमदम मेरे,
तेरी आँखों से ही देखूँगी यह जहाँ जो बसाया है मैंने,
आज मायूस बैठी हूँ तो चंद अश्क बह चले है मेरे,
वर्ना कितने रोते हुए चेहरों को हंसाया है मैंने,
कुछ पल जो हंस के काटे वो समेटे तो लगा,
थोडा सा ही सही, पर जिन्दगी को खूब जिया है मैंने।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

गुरुवार, 28 जून 2012

तेरी याद

काश कुछ लम्हों को हम अपनी गिरफ़्त में रख पाते,
तो आज अपने सर पे तेरे हाथ की न कमी पाते।
तेरी गोद से उठने की जो खता हम न करते,
तो आज तेरे क़दमों में इस सर को झुका पाते।
तूने नाज़ जो हमारे तब यूं न उठाये होते,
तो आज अपनी जिद पे हम खुद को न खफ़ा पाते।
तेरी ऊँगली को पकड़ के जो चलना न सीख पाते,
तो दुनिया की इस दौड़ में दो कदम भी न चल पाते।
तूने नींद को मेरी जो कस के न डांटा होता,
तो तेरी कसम आज भी हम सकूं से न सो पाते।
तेरी जिन्दादिली ने हमको मुस्कुराने की वजह दे दी,
वरना इस जहाँ के ग़म हम हंस के न उठा पाते।
जिन्दगी के वर्क भी गर हम फिर से पलट पाते,
तो आज भी मचल के पहले पन्ने पे पहुँच जाते।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

गुरुवार, 31 मई 2012

तम्मना

जिन्दगी की रहगुजर में कोई कमी सी रह गई,
मिल गई कई सौगातें बस तेरी कमी सी रह गई।

अश्कों के बह जाने की रवायत के हम कायल ना थे,
फिर  न जाने पलकों पे क्यों यह नमी सी रह गई।

आपकी दुनिया में हम दोस्ती की हिमाकत कर बैठे,
यह गल्ती बस इक बार हुई यह खलिश सी रह गई।

वो ख़्वाब जो दिन रात हम खुली आँखों से भी देखा किये,
उन ख़्वाब को बस शब भर जीने की तम्मना रह गई।

पा कर जब खोया तुझे तो यह एहसास पहली बार हुआ,
धड़कते सीने में कुछ आवाज़ सी शायद रह गई।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

गुरुवार, 24 मई 2012

बेसुरे प्रश्न

लोग कहते हैं
तुम्हारी कविता में लय नहीं है,
कुछ सुर नहीं है, मेल नहीं है।
कहाँ से लाऊं मैं सुर बताओ -
मैं रास्ते में पड़े हुए शब्द बीनता हूँ,
इधर उधर छिटके कुछ अक्षर चुनता हूँ,
फिर आज के माहोल में ढालता हूँ,
उनसे जो बन पाए वही निकलता हूँ।
आज के दौर में,
भ्रष्टाचार तो है,
पर सादगी नहीं है।
नेता तो हर तरफ हैं,
पर आदमी नहीं है।
मेट्रो की लाइन तो हैं,
पर पुल में मजबूती नहीं है।
बाबा तो हर मोड़ पर हैं,
पर चमत्कारी विभूति नहीं है।
हर कोई यहाँ अपने,
मतलब की रोटी सेकता है।
दीन धरम तो छोड़ो,
माँ बेटी की आबरू भी बेचता है।
खुद को ही भगवन बना,
रोज माथा टेकता है।
अपना पेट भर कर, लोगों के,
मुहं का निवाला फेंकता है।
कभी ख़ुद से शर्मसार हो,
मैं अपने शब्द ख़ुद ही छुपाता हूँ।
समाज का यह अक्स देख कर,
मैं खुद ही काँप जाता हूँ।
प्रश्न मेरी आँखों में हैं,
दिल में हैं
और जेहन में भी हैं।
तो प्रश्न तो प्रश्नों की,
भाषा ही जानते हैं।
प्रश्न तो
न सुर को,
न लय को,
और न ताल को
पहचानते हैं ...

© उपमा डागा पार्थ २०१२

बुधवार, 23 मई 2012

एहसास

मिट्ठी, यह नाम लेते ही हमारे मुंह में एक मिठास सी घुल जाती है। आज उसी की बारहवी सालगिरह पर उसे तोफहे में क्या दें बस इसी कशमकश में थी कि ख्याल आया कि कुछ ऐसा देना चाहिए जो सदैव उसके पास रहे। चंद शब्दों को बटोर कर उसके लिए एक सपना बुना है... और अब वो समय आ गया है जब शब्दों के मायने उसको समझ आने लगेगें।
मेरी बेटी के लिए एक तोहफा (24 मई  2012):

दुआएं तो बिना बोले सारी ही तुम्हारी है,
फिर भी चंद सतरें कागज पे उतारी हैं,
कुछ मुस्कुराहटें जो मैंने उम्र भर में कमाई है,
वो साथ रहे तेरे ज्यों तेरी ही परछाई है,
मैं चाँद न तारे कभी तेरे लिए ला पाऊंगी,
पर जीवन की दुपहरी में कभी छोड़ के न जाऊंगी,
मेरे बस में अगर होता तुझे आँखों में छुपा लेती,
तेरे सारे ग़मों को मैं हसीं में बदल देती,
मेरे अशार तुझे शायद अब न समझ आयेंगे,
पर शायद यह कभी तुम्हें जिन्दगी के मायने समझाएंगे,
तुम इनको वक़्त की कसौटी पे रख के देख लेना,
इन खट्टे मीठे लफ्जों को कभी यूं ही चख के देख लेना,
कभी यह बन के तेरे हमराज तेरे साथ ही हो लेंगे,
कभी मेरी छुअन बन के तुझे प्यार से यह चूमेंगे,
कभी आ के रातों में तुझे सहला के सुला देंगे,
कभी मेरी तरह आ के तुझे नींद से जगा देंगे,
कभी बस ऐसे ही आ के वो तुझ से लिपट जायेंगे,
हम हैं! बस चुपके से यह एहसास करवा जायेंगे,
हम हैं! बस चुपके से यह एहसास करवा जायेंगे!

© उपमा डागा पार्थ २०१२

माँ

माँ—एक शब्द जो होठों पे एक मुस्कान और चेहरे पे एक सकूं सा छोड़ जाता है… या फिर एक सहारा जो मुश्किल में हमें थाम लेता है, या फिर एक एहसास जो वजूद को दुनिया से बचा के रखता है। माँ के इतने रूप हैं कि चाहते हुए भी उसे एक धागे में पिरोना नामुमकिन सा लगा।

मैंने एक छोटा सा प्रयास किया है माँ के भिन्न -भिन्न रूपों को तीन अलग कविताओं में दर्शाने का—कभी वो परेशां है अपनी बेटी की शादी न होने से तो कभी उसका अपना परिवार उसके बुढ़ापे से। और आखिरी कविता में वो माँ है जिसने मुझे इस लायक बनाया कि मैं कुछ रच सकूँ।

मैं उनके बारे में ज्यादा नही बस यही कहूँगी कि तेरे एहसास से ही इक सोंधी सी महक आती है, माँ तेरे होने से मेरी दुनिया खुशगवार हो जाती है। उस खुदा का शुक्रिया भी करना चाहूंगी जिसने माँ जैसी नेमत दे कर हमें अपने होने का एहसास दिलाया।

1

आज माँ फिर से परेशां है।
ऑफिस से आते ही,
माँ के जल्दी जल्दी चलते हाथ
और माथे पर पड़े परेशानियों के बलों ने
उसे एक अनकहा सन्देश पहुंचा दिया,
फिर किसी की कही बात ने
माँ का दिल दुखा दिया।

एक बेटी...
जो कमाती तो है
पर ब्याहता नहीं है।
जो कब से तीस के पार है
पर योग्य वर का अभी भी इंतज़ार है।

यह सुनते सुनते उसके कान पक गए हैं,
उसे लगा शायद बोलने वाले भी थक गए हैं,
पर लोग चुप रह कर भी चुप नहीं रहते हैं,
कभी दबी आवाज़ में, तो कभी मुहं पे ही कुछ कहते हैं।

वो सोचती कोई उसको घर बैठे तो नहीं खिलाता है,
तब उसके बारे में सोच कर उनका क्योँ कौर अटक जाता है,
क्योँ ये सवाल, ये ताने, मेहमान बन कर आते हैं
फिर उसके ही घर में रह कर उसे चिढ़ाते हैं?
रिश्ते भी अब जो आते हैं तमाशाइयों की तरह लगते हैं,
उम्र के तराजू में वो हर बात को परखते हैं,
मर्द तो बयालीस के भी बांके जवान कहलाते हैं
फिर औरतों की बारी में क्योँ पैमाने बदल जाते हैं
शादी न होने के कारण उसपे प्रश्नचिंह क्यों लगाये जाते हैं
क्यों उसे झिंझोड़ कर अकेलेपन के बादल दिखाये जाते हैं।

पर माँ है कि इसी चिंता में घुली जाती है
रिश्तेदारों के सवालों से कतराती है
पड़ोसियों की नजरो से खुद को बचाती है
कभी खुद को संभालती तो कभी हताश हो जाती है।

वो पलट के कई बार लोगो को चुप करवाना चाहती है
पर माँ को देख कर फिर खुद ही चुप हो जाती है
कोई बताये उसे कि वो इस अविवाहिता रूपी लेबल का क्या करे
अब तक छह पंडितो से मिल चुकी है,
तीन बार पूजा रखवा चुकी है,
पांच अंगूठियाँ पहन कर निकलती है,
दो तावीज़ भी बांधे रखती है।

वो
हर बार माँ की परेशानी कम करने की कोशिश करती है।
पर माँ है कि
माँ होने के कारण,
हर बार परेशां हो ही जाती है|

2

सुनो जी! माँ अब बूढी हो गई है।
ऑफिस से आते ही बीवी ने यह बताया,
चिंता में मैंने अपना हाथ सर पे लगाया।
घुटने का दर्द उनका फिर से बढ़ गया है,
कल शाम से गर्दन में भी बल पड़ गया है,
न रात को ढंग से सोती हैं,
न दिन में चैन आता है,
ऊपर से उनका खांसी
जुकाम न कभी जाता है,
मैं सारा दिन घर में
इधर से उधर फिरती हूँ,
कभी बच्चों कभी माँ के बीच
चक्की की तरह पिसती हूँ।
मैं हूँ-हाँ करके इधर उधर देखता हूँ,
अपनी बूढी माँ के कमरे की तरफ बढता हूँ।
बीवी कहती है - माँ अब आँखों से कम देख पाती है,
फिर कैसे वो मेरे माथे के बल पढ़ पाती है।
वो माँ जिसको कोई आवाज़ मुश्किल से सुनाई देती है,
वो कैसे मेरे बोलों में बेचैनी भांप लेती है।
मेरी बूढी माँ जो दिन बहर खांसती रहती है,
वो कैसे सुबह मेरे लिए चाय बना लती है।
वो माँ जो कभी बुखार से
तो कभी दर्द से तडपती है,
वो कैसे हर समय,
कुछ बुनती,कुछ काटती
तो कभी कपडे तह लगाती है।
पर बीवी है वो मेरी
वो सही ही सोचती होगी
शायद माँ धीरे धीरे
बूढी हो चली होगी...

3


ठंडी हवा की तरह माँ आ के थपथपा जाती है,
जाने कैसे वो थकी आँखों को सोने के लिए मना पाती है,
माँ हर टुकड़े में से मेरा एक कौर निकाल लेती है,
मेरा पेट भर के वो मुस्कुराती हुई सो जाती है।

मुझे बचपन की कोई लोरी उसकी याद नहीं,
पर मेरे रतजगो में वो जगती हुई दिख जाती है,
कभी तो खुद ही उदासी के बादलों से लड़ती है,
और कभी सावन की बूंदों की तरह बिखर जाती है।

वो अपना बचपन भी मेरी आँखों से देखती है,
और ख़्वाबों के तिलस्म भी मेरे लिए माँ बुनती है,
मेरी मुस्कुराहट से मेरे राज सारे जान जाती है,
हँसी के ढेर में भी वो इक फीकी हँसी पहचान लेती है।

उसके लिए न मंदिर में घंटी न मस्जिद में दुआ मांगी जाती है,
पर इक हलकी सी चोट पे भी माँ की याद सबसे पहली आती है,
जिन्दगी की धूप में वो छांव बनी नज़र आती है,
और कभी  इक आंसू से वो मोम सी पिघल जाती है।

तेरे एहसास से ही इक सोंधी सी महक आती है,
माँ तेरे होने से मेरी दुनिया खुशगवार हो जाती है।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

कुछ दिन

कुछ दिन बस यूं ही गुजर जाते है,
फ़कत अपने होने का बोझ लपेटे हुए,
आँख खुलने से आखिरी करवट लेने तक,
एक सन्नाटा सा खुद में समेटे हुए,
सवाल जवाबों की धुरी से परे,
नए पैमानों में कुछ परखते हुए,
घड़ी की सुइयों की गिरफ्त में फसें,
इक सांस लेने को कहीं तरसते हुए,
मौसम के हर मिजाज़ को ताक पे रख,
अपनी ही आग में झुलसते हुए,

ऐसे दिन शब्दों में बांधे नहीं जाते,
बस काटे जाते हैं बिना कोई तवक्को किये हुए।

© उपमा डागा पार्थ २०१२

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

दरिंदगी

सुबह की अख़बार, चाय का कप और हल्की सी धूप,
हमेशा मीठी सी मुस्कान होठों पे छोड़ ही जाते हैं,
गॉसिप सेक्शन पहले देखती हूँ,
ताकि हकीकत में जाने की हिम्मत जुटा सकूँ,
घोटालों को पचा सकूँ,
राजनैतिक घटनाक्रम खुद को समझा सकूँ।

देश विदेश की बड़ी ख़बरों को पढ़ कर आगे बढती हूँ,
एक-दो की गिनती लांघते हुए पाँचवे पन्ने पे पहूँचती हूँ,
एक खबर पढ़ के मैं थोडा ठिठकती हूँ,
फिर से उस खबर को दोबरा मैं पढ़ती हूँ'...

चाय ने मानो अपना जायका ही बदल डाला,
ताज़गी की जगह मुंह ज़हर से भर डाला,
अख़बार की जगह मानो बिच्छू चारों तरफ हो,
डंक लिए काटने को तैयार ज्यूँ बैठे हो,

पचहत्तर वर्षीय औरत का बलात्कार...
फिर कतल, बाईस वर्षीय युवक फरार...

क्या उस युवक ने एक बार भी उसको देखा होगा,
हैवानियत के तांडव में बस जिस्म समझ के नोचा होगा,
क्या बुढ़िया को देख अपनी माँ न याद आई होगी,
उसकी हड्डियों की टूटन से आत्मा न चिल्लाई होगी,
वो सकते में आ बेटे की उम्र के उस वहशी को देखती होगी,
या शर्म के मारे अपनी आँखे ही न खोलती होगी,
इन्ही अनर्थो पे भगवान की चुप्पी खलती है,
उसके अस्तित्व पे संदेह पैदा करती है,
मारा क्यों उसको वो खुद ही मर गई होती,
सारी उम्र बेटा कहने से किसी को डर रही होती,

पर सवालो के जवाब में सवाल ही दोहराए जाते हैं,
ख़ामोशी में मानो शब्द ही ग़ुम हो जाते हैं,
हम सभ्य लोग ऐसी बातों पे अक्सर चुप हो जाते हैं,
अख़बार के पन्ने पलट कर खुद शर्मसार हो जाते हैं,

दरिंदगी शायद किसी के लहू से ही धुलती होगी,
शर्मिंदगी शायद यूं ही धीरे-धीरे सुबकती होगी...

February 11, 2011:Gurdev Kaur of Sanwat Khera village of Sirsa in Haryana was raped and strangled to death by one Nikka Singh. Observing that it was a "rarest of the rare case", the Additional Sessions Judge, Sirsa has recently awarded death penalty to the rapist. More

January 6, 2011: A 75-year-old woman was sexually assaulted and murdered at her residence in the posh Sector 21 locality of Chandigarh. More

© उपमा डागा पार्थ २०१२

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

नन्ही फ़रियाद!

इक प्रीत भरा बचपन,
अपनी माँ से बिछड़ गया।
स्टेशन की भीड़ में,
उसका हाथ ही छिटक गया।

अनजाने चेहरों में ,
वो इक चेहरा तलाशती होगी,
मम्मी-मम्मी कहती वो ,
इधर उधर भागती होगी,
कभी वो रो रही होगी,
कभी खुद ही चुप हो रही होगी,
कभी अपने ही हाथों से
आंसू पोंछती होगी,
उसने अपनी सारी शैतानियाँ ,
अब ताक पे रख दी होंगी,
उसकी मासूम आँखें बस,
माँ के लिए तरसती होंगी।

खुदा करे! वो दुनिया के,
सबसे अच्छे हाथों में आए।
जो महफूज़ रखे उसको,
और अपनों तक पहुंचाए।

मैं दुआ करती हूँ उसके लिए,
आप सब भी करना।
ऐ खुदा 'प्रीत' पर हमेशा,
रहमत की नज़र करना।

Dedicated to the little girl Preet Kaur (Palki) who went missing from Amritsar in January 2012

© उपमा डागा पार्थ २०१२

निशा अब शांत है

आज निशा चुप है
बिलकुल शांत
मानो एक विराम मिल गया हो
बारह सालों के संघर्ष का
घर से ऑफिस, ऑफिस से घर
बच्चों की परवरिश,
स्कूल की फ़ीस,
मकान की किश्त,
महीने का राशन,
बस का किराया,
सब्जियों के भाव

बारह साल पहले
उसने जंग शुरू की थी
पियक्कड़ पति के खिलाफ,
उसकी ज्यादतियों के खिलाफ,
ख़तम होती सहनशक्ति के खिलाफ

पर क्या हासिल हुआ उसे
एक के बाद एक पेशी
निचली से ऊपरी अदालत
ख़तम होती जमा पूंजी
कम होते गहने और
टूटती उम्मीद

पर आज वो फिर एक बार आयी थी
सारी हिम्मत जुटा
पुराने पर्स में रखे
कुछ आखिरी पैसे
अपने वकील के लिए ले
वह चल दी
फ़ैसले के इंतज़ार में

पर अदालत में
फटे बम के बारूद पर
निशा का भी नाम था
उस आवाज़ को सुन वह जब तक पलटती
किसी और अदालत
का दरवाज़ा खटखटाती
तब तक बारूद ने उसको
हवा में उड़ा दिया

उसकी आँखों का प्रश्न चिन्ह
धुंए के गुबार ने छिपा दिया
एक हाथ में केस की फ़ाइल,
दूसरे में छोटा सा पर्स,
और उसमें रखे कुछ मुड़े तुड़े नोट
कोई भी इस फ़ैसले के लिए तैयार नहीं था
और
नेताओं का बयान जारी था।

७ सितम्बर, २०११ को दिल्ली हाई कोर्ट में हुए आतंकवाद की घटना पर

© उपमा डागा पार्थ २०१२