माँ—एक शब्द जो होठों पे एक मुस्कान और चेहरे पे एक सकूं सा छोड़ जाता है… या फिर एक सहारा जो मुश्किल में हमें थाम लेता है, या फिर एक एहसास जो वजूद को दुनिया से बचा के रखता है। माँ के इतने रूप हैं कि चाहते हुए भी उसे एक धागे में पिरोना नामुमकिन सा लगा।
मैंने एक छोटा सा प्रयास किया है माँ के भिन्न -भिन्न रूपों को तीन अलग कविताओं में दर्शाने का—कभी वो परेशां है अपनी बेटी की शादी न होने से तो कभी उसका अपना परिवार उसके बुढ़ापे से। और आखिरी कविता में वो माँ है जिसने मुझे इस लायक बनाया कि मैं कुछ रच सकूँ।
मैं उनके बारे में ज्यादा नही बस यही कहूँगी कि तेरे एहसास से ही इक सोंधी सी महक आती है, माँ तेरे होने से मेरी दुनिया खुशगवार हो जाती है। उस खुदा का शुक्रिया भी करना चाहूंगी जिसने माँ जैसी नेमत दे कर हमें अपने होने का एहसास दिलाया।
1
ऑफिस से आते ही,
माँ के जल्दी जल्दी चलते हाथ
और माथे पर पड़े परेशानियों के बलों ने
उसे एक अनकहा सन्देश पहुंचा दिया,
फिर किसी की कही बात ने
माँ का दिल दुखा दिया।
एक बेटी...
जो कमाती तो है
पर ब्याहता नहीं है।
जो कब से तीस के पार है
पर योग्य वर का अभी भी इंतज़ार है।
यह सुनते सुनते उसके कान पक गए हैं,
उसे लगा शायद बोलने वाले भी थक गए हैं,
पर लोग चुप रह कर भी चुप नहीं रहते हैं,
कभी दबी आवाज़ में, तो कभी मुहं पे ही कुछ कहते हैं।
वो सोचती कोई उसको घर बैठे तो नहीं खिलाता है,
तब उसके बारे में सोच कर उनका क्योँ कौर अटक जाता है,
क्योँ ये सवाल, ये ताने, मेहमान बन कर आते हैं
फिर उसके ही घर में रह कर उसे चिढ़ाते हैं?
रिश्ते भी अब जो आते हैं तमाशाइयों की तरह लगते हैं,
उम्र के तराजू में वो हर बात को परखते हैं,
मर्द तो बयालीस के भी बांके जवान कहलाते हैं
फिर औरतों की बारी में क्योँ पैमाने बदल जाते हैं
शादी न होने के कारण उसपे प्रश्नचिंह क्यों लगाये जाते हैं
क्यों उसे झिंझोड़ कर अकेलेपन के बादल दिखाये जाते हैं।
पर माँ है कि इसी चिंता में घुली जाती है
रिश्तेदारों के सवालों से कतराती है
पड़ोसियों की नजरो से खुद को बचाती है
कभी खुद को संभालती तो कभी हताश हो जाती है।
वो पलट के कई बार लोगो को चुप करवाना चाहती है
पर माँ को देख कर फिर खुद ही चुप हो जाती है
कोई बताये उसे कि वो इस अविवाहिता रूपी लेबल का क्या करे
अब तक छह पंडितो से मिल चुकी है,
तीन बार पूजा रखवा चुकी है,
पांच अंगूठियाँ पहन कर निकलती है,
दो तावीज़ भी बांधे रखती है।
वो
हर बार माँ की परेशानी कम करने की कोशिश करती है।
पर माँ है कि
माँ होने के कारण,
हर बार परेशां हो ही जाती है|
2
सुनो जी! माँ अब बूढी हो गई है।
ऑफिस से आते ही बीवी ने यह बताया,
चिंता में मैंने अपना हाथ सर पे लगाया।
घुटने का दर्द उनका फिर से बढ़ गया है,
कल शाम से गर्दन में भी बल पड़ गया है,
न रात को ढंग से सोती हैं,
न दिन में चैन आता है,
ऊपर से उनका खांसी
जुकाम न कभी जाता है,
मैं सारा दिन घर में
इधर से उधर फिरती हूँ,
कभी बच्चों कभी माँ के बीच
चक्की की तरह पिसती हूँ।
मैं हूँ-हाँ करके इधर उधर देखता हूँ,
अपनी बूढी माँ के कमरे की तरफ बढता हूँ।
बीवी कहती है - माँ अब आँखों से कम देख पाती है,
फिर कैसे वो मेरे माथे के बल पढ़ पाती है।
वो माँ जिसको कोई आवाज़ मुश्किल से सुनाई देती है,
वो कैसे मेरे बोलों में बेचैनी भांप लेती है।
मेरी बूढी माँ जो दिन बहर खांसती रहती है,
वो कैसे सुबह मेरे लिए चाय बना लती है।
वो माँ जो कभी बुखार से
तो कभी दर्द से तडपती है,
वो कैसे हर समय,
कुछ बुनती,कुछ काटती
तो कभी कपडे तह लगाती है।
पर बीवी है वो मेरी
वो सही ही सोचती होगी
शायद माँ धीरे धीरे
बूढी हो चली होगी...
3
ठंडी हवा की तरह माँ आ के थपथपा जाती है,
जाने कैसे वो थकी आँखों को सोने के लिए मना पाती है,
माँ हर टुकड़े में से मेरा एक कौर निकाल लेती है,
मेरा पेट भर के वो मुस्कुराती हुई सो जाती है।
मुझे बचपन की कोई लोरी उसकी याद नहीं,
पर मेरे रतजगो में वो जगती हुई दिख जाती है,
कभी तो खुद ही उदासी के बादलों से लड़ती है,
और कभी सावन की बूंदों की तरह बिखर जाती है।
वो अपना बचपन भी मेरी आँखों से देखती है,
और ख़्वाबों के तिलस्म भी मेरे लिए माँ बुनती है,
मेरी मुस्कुराहट से मेरे राज सारे जान जाती है,
हँसी के ढेर में भी वो इक फीकी हँसी पहचान लेती है।
उसके लिए न मंदिर में घंटी न मस्जिद में दुआ मांगी जाती है,
पर इक हलकी सी चोट पे भी माँ की याद सबसे पहली आती है,
जिन्दगी की धूप में वो छांव बनी नज़र आती है,
और कभी इक आंसू से वो मोम सी पिघल जाती है।
तेरे एहसास से ही इक सोंधी सी महक आती है,
माँ तेरे होने से मेरी दुनिया खुशगवार हो जाती है।
© उपमा डागा पार्थ २०१२